गीता  ज्ञान  का  आध्यात्मिक  रहस्य   – परमात्म-अवतरण एवं कर्मयोग

              The Great Geeta           No• 048 

    परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग   

      पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

                       एक बार एक सन्यासी राजा जनक के  पास  जाता  है ! राजा  जनक  से कहता है  कि राजन ! हमने  सब  चीज़ों का  सन्यास  कर  लिया  छोड़  दिया  लेकिन  उसके बाद भी हम अपने मन को कभीकभी  कंट्रोल  नहीं कर पाते  हैं ! आवेग इस  तरह  आता  है  जो   मन  को  कंट्रोल  करना असम्भव सा महसूस होता है और आप  इस  सुख सुविधा  के  भौतिक  साधनों  के  बीच में रहते हुए अपने आपको विदेही कहते  हो , यह कैसे  सम्भव है ? मुझे समझ में नहीं आता है !  क्योंकि मैने सब कुछ  छोड़  दिया  है ,  उसके   बाद  भी  मैं  अपने मन को कंट्रोल नहीं कर पाता हूँ !  सबके  बीच  में रहते हुए हम कैसे विदेही बन सकते है ? क्या आप मुझे बता सकते हैं ?

              राजा जनक ने कहा कि मुझे विदेही क्यों कहते हैं ? यह प्रशन तो बहुत अच्छा  पूछा लेकिन मैं थोड़ा अपने कार्य में व्यस्त हूँ ! जब मैं निवृत्त हो जाऊं फिर आपके साथ  बैठकर के  इस  बात  पर चर्चा  करूंगा  !  लेकिन  तब  तक  आपका  समय कीमती है , वो भी  व्यर्थ  नहीं जाना चाहिए ! आप एक  काम  कीजिए  जब  तक  मैं  अपने  कार्य  से निवृत्त होकर के आता हूँ , तब तक आप  महल के दूसरी तरफ बहुत सुन्दर कारीगरी की गई है ! आप उस   कारीगरी  का   अवलोकन  करके   आईये  ! सन्यासी ने कहा ठीक है ! लेकिन राजा ने कहा कि अभी  कारीगरी  चल रही है ! वहाँ लाईटें लगी नहीं हैं  !  इसलिए  आपको  ये  दीपक  ले  जाना पड़ेगा जिसकी रोशनी में ही आप सब कुछ देख  सकते हैं , क्योंकि वहाँ अंधेरा होगा !  सन्यासी  ने कहा ठीक है !

                 राजा ने कहा एक बात और मैं आपको बता दूं ! खिड़की दरवाजे भी लगे नहीं हैं और वही हवा  की  दिशा है !  इसलिए आपको ध्यान  रखना पड़ेगा  कि  कहीं   दीपक  बुझ  न  जाए  !  क्योंकि दीपक अगर बुझ गया तो आप वो  कलाकृति देख नहीं पाएंगे ! सन्यासी ने कहा ठीक है ! वो  सन्यासी दीपक  लेकर  के  गया  और  सारी  कलाकृति को देखकर  के  जब वापिस  आया  तब तक राजा भी अपने कार्य से निवृत्त हो गया था ! दोनों बैठे ! राजा ने सहज भाव से सन्यासी  से पूछा आप देखकर के आये , तो सन्यासी ने कहा हाँ , देखकर  के आया ! कैसी लगी  कलाकृति , तो  सन्यासी ने कहा  बहुत सुन्दर कलाकृति है ! तब राजा ने धीरे से पूछता है , ध्यान कहाँ था ?  सन्यासी  ने कहा , कि दीपक  के ऊपर ! वास्तव  में ध्यान तो दीपक पर था , क्योंकि हवा  तेज चल  रही  थी ! दीपक  बुझ  नहीं चाहिए   इसलिए उसी पर ध्यान था !

                                 तब राजा जनक ने कहा कि यही  मेरी  जीवनमुक्त्त   स्थिति  का  रहस्य  है  ! जीवन में  रहते  हुए  मुक्त्ति  का अनुभव करने  के लिए या विदेही  बनने  के लिए  साधन  कोई  बाधा नहीं है ! लेकिन  आप का  ध्यान  कहाँ होता है , ये मुख्य  बात  है  ! आपने   सब  कुछ  छोड़  दिया है लेकिन अगर  ध्यान में वही  सब  कुछ  घूम  रहा है  तो उन्हें छोड़ने से कोई फायदा नहीं है ! मैं इन सभी साधनसुविधाओं  व  भौतिक  चाज़ों  के  बीच  में रहता हूँ लेकिन अपना ध्यान उस आत्मा दीपक पर रखता हूँ ! इसलिए  कहा  जाता  कि  साधन  बुरे  नहीं  है लेकिन  मेरी मनोवृत्ति , मेरा  ध्यान कहाँ है ? उसके ऊपर सारा  निर्भर करता है ! मैं  जीवन तो जी रहा हूँ लेकिन  किस तरह से जी रहा हूँ , यह महत्त्वपूर्ण है ! इच्छाओं  और  क्रोध  से  मुक्त्त  आत्मसंयमी जीवन ,  जिस  के  मन  में  कोई  संशय   नहीं  रहा अर्थात् आत्मज्ञानी , अंतर्मुखी , सदा सुखी , अपने पापों  को  नष्ट  कर ,  इस  लोक  में  रहते  हुए भी जीवनमुक्त्त है ! वह सिद्ध पुरूष है !