The Great Geeta -पाँचवां और छठाा अध्याय

 No• 049 – 

गीता  ज्ञान  का  आध्यात्मिक  रहस्य

     परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग   

    पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

                    भगवान अर्जुन को ध्यान की प्रक्रिया बताते हैं कि हे अर्जुन ! बाहर के विषयों , दृश्यों का चिंतन  नहीं  करो ! अपने  अंतर्चक्षु  को भृक्रुटी  के बीच स्थित करो ! क्योंकि  यही आत्मा  का अनादि स्थान है ! मेडिकल  साइंस में  इस बात का उल्लेख है कि हाइपोथैलेमस  और पिटयूटरी  ग्लैंड के बीच में आत्मा  का निवास  है , जो  एकदम  भृक्रुटी  के मध्य में स्थित है !

                            इसलिए मनुष्य मन्दिर में जाता है , तो आत्मस्वरूप  का भाव  प्रगट करने  के लिए वो तिलक  लगाता है ! भारत  में प्रथा है कि मन्दिर में  जब  जाते  हैं  तो  चमड़े  की   चीज़  को  बाहर उतारते हैं , फिर  अन्दर  जाकर  के तिलक  लगाते हैं ! यहाँ ही क्यों लगाया ? क्योंकि  वहीं आत्मा का निवास स्थान है ! उसके  बाद  भगवान की मूर्ति के आगे हाथ  जोड़कर  के  नमन  करते  हैं  ! ये  प्रथा चलती आई  है ! परन्तु  उसके पीछे  का भाव कभी किसी  ने नहीं  समझा की  चमड़ें  की  ही चीज़ को बाहर  क्यों  उतारा  !  वो   चमड़ा  तो   उतार  दिया लेकिन  वास्तव  जो देह अभिमान  रूपी चमड़ा को बाहर  उतारने  की  बात  है  !  फिर  अन्दर  आकर के तिलक लगाया माना  स्वयं को  देह नहीं आत्मा समझा !

             मैं एक शुद्ध पवित्र आत्मा हूँ इस भाव को विकसित  करो  ! फिर  भगवान  की मूर्ति  के आगे जाकर के हे प्रभु !  मैं फलाना  आपको  नमन नहीं कर  रहा  हूँ , लेकिन  मैं  आत्मा  आपकी  सन्तान आपको  अपनी  भावनायें   अर्पित  कर  रहा  हूँ  ! कितना  सुन्दर  भाव  है  ये ! लेकिन क्या कभी हम इस  भाव  के साथ में गए ? नहीं , तो आज के बाद हमें इस भाव को विकसित करना चाहिए ! भगवान ने इसलिए  इस  भाव  को विकसित  करने के लिए अर्जुन को कहा कि बाहर के दृश्यों और विषयों का चिंतन नहीं करो ! जब भी मेडिटेशन में बैठो , ध्यान  में  बैठो , परमात्मा के सम्मुख बैठो तो  उस  समय बाहर के विषयों और दृश्यों का चिंतन  नहीं  करो ! लेकिन   अपने    अंतर्चक्षु   को  फालना  व्यक्त्ति , फालना   कारोबार ,  फालना  काम  रह  गया ,  ये सोचने  के  बजाय  जब  वहाँ  पर  बैठ हो  तो  सब चिंतनों को बंद करके स्वयं के अंतर्चक्षु  को भृक्रुटी के बीच  में  स्थित   करो अर्थात्  स्वयं  को  आत्मा निश्चय करो , मन को शान्त करो और परमात्मा के ध्यान   में  बुद्धि  को  एकाग्र   करो   तथा   सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति कल्याण की  कामना को प्रवाहित कर  ,  सांसारिक   दुःखों  से    छुटकारा   दिलाकर परमशन्ति  को  प्राप्त  कर  लो ! ये ध्यान की  सही विधि  है  !  हम   जितनी   अच्छी   भावनाओं   को प्रवाहित  करेंगे , संसार  में  उतनी  ही  ये  भावनायें वापिस   आयेंगी  !  जैसे  ही  आप  भावनाओं  को फैलाते हैं , वहीं  भावनायें  पुनः आपके  पास  लौट कर  आयेंगी , क्योंकि ये अनादि  कर्मों का सिद्धांत है ! इसका  एक बहुत  सुन्दर  उदाहरण  को अगले अध्याय में  वर्णन करेंगे !