अपेक्षा ही दुख का कारण….

 

फिर वही प्रशन उठता है गीता का भगवान परमात्मा शिव वा श्रीकृष्ण ? ??

अपेक्षा ही दुख का कारण….

किसी दिन एक मटका और गुलदस्ता साथ में खरीदा हो और घर में लाते ही 50 रूपये का मटका अगर फूट जाए तो हमे इस बात का दुख होता है, क्योंकि मटका इतनी जल्दी फूट जायेगा ऐसी हमे कल्पना भी नहीं थी पर गुलदस्ते के फूल जो 200 रूपये के है वो शाम तक मुरझा जाए तो भी हम दुखी नहीं होते क्योंकि ऐसा होने वाला ही है यह हमे पता ही था।

मटके की इतनी जल्दी फूटने की हमे अपेक्षा ही नहीं थी, तो फूटने पर दुख का कारण बना, पर फूलो से अपेक्षा नहीं थी इसलिये वे दुख का कारण नहीं बनें।

इसका मतलब साफ़ हे कि जिसके लिए जितनी अपेक्षा ज्यादा उसकी तरफ से उतना दुख ज्यादा और जिस के लिए जितनी अपेक्षा कम उस के लिए उतना ही दुख भी कम।

No• 037

इसके आगे अर्जुन का एक और प्रशन आता है  कि किन परिस्थितयाों  में और कब प्रगट होते  हैं ?  यह  सवाल  हम  में  से  भी  कई  का हो सकता है !

              भगवान ने कहा यदायदा ही धर्मस्थ जबजब  परमधर्म  और  परमात्मा  के प्रति ह्रदय ग्लानि  से  भर  जाता  है , जब  अधर्म की वृद्धि हो जाती है , तबतब  में  अपने  स्वरूप को रचता  हूँ और  स्वयं अवतरित  होता  हूँ ! यहाँ अवतरण का अभिप्राय  पुनर्जन्म  लेने  से  नहीं  है , अपितु  पुनः अवतरित होना है ! भगवान कैसे अवतरित होते हैं , इसका वर्णन करते हुए कहते हैं  कि परित्राणाय साधुनाम अर्थात् परमसाध्य  परमात्मा के समीप ले जाने वाले विवेक , वैराग्य और दैवी संस्कारों को निर्विध्न , इस संसार में प्रवाहित  करने तथा दृष्कृत के कारण काम , क्रोध , राग , द्वेष इत्यादि विकारों का  पूर्ण   विनाश  करने  के   लिए  और  परमधर्म  सनातन  धर्म  की   पुनः  स्थापना करने  के लिए मैं युगेयुगे प्रगट होता हूँ ” ! यहाँ युग का तात्पर्य  ये नहीं है कि सतयुग , त्रेतायुग , द्वापर  युग , कलियुग सब  में  आते  हैं , नहीं !  जब  संसार  में  दुष्कृत के कारण   काम ,  क्रोध , राग , द्वेष   इत्यादि  विकार सम्पूर्ण  रूप  में फैल  जाते हैं  तब  उसका  विनाश करने  के लिए और  परम सतधर्म सनातन धर्म की स्थापना  करने के  लिए , ऐसे  युगेयुगे प्रगट होता हूँ ! ऐसा युग कब होता है ? ऐसा युग कलियुग जब अपने सम्पूर्ण रूप  में आ  जाता है , तब  परमात्मा भी अवतरित होते हैं ! ऐसे युग में आकर अधर्म का नाश और  परमसत्य  धर्म  की  स्थापना  करते हैं ! अर्थात् सतयुग की स्थापना करते हैं

                     द्वापर युग में अगर भगवान आये तो द्वापर के बाद तो कलियुग आता है ! तो क्या गीता का ज्ञान  से  घोर  कलियुग की स्थापना  होती है ? नहीं ! लेकिन  कलियुग  के अन्त  में जब  ऐसे  युगे युगे आते हैं , तब अधर्म का नाश करते हैं ! क्योंकि कलियुग में  ही अधर्म अपनी चरम सीमा को प्राप्त कर  लेता है ! तो  ऐसे युगेयुगे  आकर  अधर्म का सम्पूर्ण  विनाश  और  सतधर्म  की  स्थापना  करने अर्थ परमात्मा  का दिव्य  अवतरण  इस  संसार में होता है और अपना कार्य वे करते हैं ! यहाँ पर एक और महत्त्वपूर्ण सवाल  इस  अध्याय  के  अन्त  में अर्जुन  पूछता  है  कि  भगवान  जब  कहते हैं  कि हमारा  जन्म और  कर्म दिव्य  अलौकिक  है ,  इन चर्म चक्षुओं से देखा नहीं जा  सकता है ! तो अर्जुन पूछता हैहे प्रभु ! कौन  उसे  देख सकता है  कौन उसे समझ सकते है ? भगवान  ने कहा  कि  केवल तत्वदर्शी  अर्थात्  जो  ज्ञान  और  तपस्या  के  बल द्वारा  पवित्र  बनते  हैं और  वे  विकराल  भय  और क्रोध  से  मुक्त्त  है , वह  मेरे  इस  दिव्य जन्म और कर्म  को  देखता  है ! अर्थात्  मेरा साक्षात्कार कर सकता है ! आत्म साक्षात्कार करने  वाला  ही  इस परिवेश  को समझ  पाता  है  कि  परमात्मा  किस अनुरागी  ( Devoted )  में   अवतरित  होते  हैैं  ! बहुत स्पष्ट कहा भगवान ने  कि यह सबके समझने के  वश   की   बात   नहीं  है  !  फिर   कौन  समझ  सकता है ? ये भी बता दिया और कौन उसको देख सकता है !  इन  स्थूल  नेत्रों  से तो  देखने  की बात नहीं  है !  लेकिन  अंर्तचक्षु  से  उसका  साक्षात्कार  कर  सकते  हैं !