अर्जुन एक महत्त्वपूर्ण प्रशन

गीता का भगवान शिव परमात्मा या श्रीकृष्ण ?

     अर्जुन एक महत्त्वपूर्ण प्रशन जिसका उत्तर भगवान  इस  प्रकार देते  हैं ! अर्जुन  ने प्रशन पूछा कि सबसे पहले आपने ये ज्ञान किसको दिया था ?

              तब भगवान कहते हैं कि अविनाशी  योग को कल्प के आदि में मैने सूर्य से कहा  था ! सूर्य से मनु को यही गीता  प्राप्त हुई , मनु  ने उसे स्मृति में संजोया  ,  मनु   से   इच्छावाक  को  मिली ,  जिसे राजत्र्षियों ने जाना ! किन्तु इस महत्त्वपूर्ण काल में ये ज्ञान लुप्त हो गया !

               भावार्थ यह है , सूर्य को कहना माना कि आरम्भ  में वर्तमान  मनुष्य  जो  संस्कार  रहित है ! सुरा ने सूर्य से मनु को दिया , इसका अर्थ है आत्मा में ही मन  है ! तो  मन  को प्राप्त  होता है ! मन  से इच्छा में अर्थात्   इच्छावाक  को  ! इच्छा जब तीव्र होकर  संस्कारों  में ढलकर , यह योग तब आचरण तक  पहुँचता है ! उस  अवस्था  में  रीद्धिसिद्धियों का संचार होता है ! इस संसार में , आज लोगों  को मेहनत नहीं करना है तुरन्त भागते हैं ! कुछ  किया नहीं और प्राप्ति  हो  गयी  या किया  किसी और ने और प्राप्ति हो गयी !  ऐसी  अवस्था जब  आती  है   जिसके प्रभाव के कारण , यह ज्ञान लुप्त  हो जाता है  !  मेहनत   करना  कोई   नहीं   चाहता   !  ये  है रहस्य   कि   सबसे   पहले    कैसे    संस्कार  रहित  मनुष्य आत्माओं को दिया गया !  

No• 034

अर्जुन फिर प्रशन पूछता है कि क्या ये  उत्तम रहस्हपूर्ण योग का वर्णन करने आप सब की तरह पैदा होते हैं , वा जन्म लेते हैं ?

उत्तर :- तब  भगवान  ने  कहा , नहीं ! स्वरूप की प्राप्ति शरीर प्राप्ति से भिन्न है ! मेरा जन्म  इन आँखों  से  देखा  नहीं  जा  सकता है !  में  अजन्मा  अव्यक्त्त  और   शाश्वत्  हूँ  !  अव्यक्त्त (  जिसको व्यक्त्त शरीर नहीं है ) इसलिए  तो रथी  बनकर के अर्जुन के रथ में आया ! में विनाश रहित , पुर्नजन्म रहित , प्रकृति को अधीन कर , योगमाया  से  प्रगट होता हूँ ! स्वरूप का जन्म पिण्ड रूप में  नहीं होता है ! मैने  किसी  माता के गर्भ  से जन्म नहीं लिया ! योग   साधना   द्वारा   अपनी    त्रिगुणमयी  प्रकृति  को स्व  वश करके  प्रगट  होता  हूँ !  इस  प्रकार परमात्मा  अपने वास्तविक  स्वरूप  को बताते हैं !

                           ✅ इससे स्पष्ट हो जाता है कि अर्जुन  के रथ  में विराजमान श्रीकृष्ण जो व्यक्त्त स्वरूप  अर्थात्  साकार  स्वरूप  था उस  व्यक्त्त स्वरूप  में , मैं  अव्यक्त्त  रूप  में  प्रवेश  होता  हूँ ! इसलिए  गीता में कहीं भी श्रीकृष्णवाच् नहीं आता है , ” भगवानुवाच आता है !  क्योंकि श्रीकृष्ण के माध्यम से भी बोलने वाला कौन था ?  श्रीकृष्ण के माध्यम से बोलने वाला परमात्मा था , जो अजन्मा है ! इसलिए  भगवान ने  अपना वास्तविक परिचय देते हुए यही स्पष्ट  किया कि मैं अजन्मा , अव्यक्त्त मैं इन  आँखों से  नहीं  देखा  जा  सकता  हूँ  !  तुम जिसको  देख  रहे  हो वो  श्रीकृष्ण है ! लेकिन तुम मुझे इन आँखों से नहीं देख सकते हो !                कितना  स्पष्ट  है  कि  श्रीकृष्ण के  माध्यम  से बोलने  वाला  कोई और  है ! मैं  अव्यक्त्त , शाश्वत्   विनाश रहित , पुनर्जन्म  रहित , प्रकृति  को अधीन करके योगमाया से  प्रगट होता हूँ  अर्थात् श्रीकृष्ण के  तन  में  मैं  प्रगट हो कर बोलने वाला परमात्मा था ! इसलिए कहा भगवानुवाच , जिसकी पूजा हम भारत भर में करते  हैं , ” ज्योतिर्लिंगम के रूप में ”   ज्योतिर्लिंगम माना जो ज्योति  का  स्वरूप है ! जो ज्योति  का  प्रतीक  है ,  वो  प्रकाशमान  अव्यक्त्त स्वरूप है !  जिसकी  पूजा  हमने  ज्योतिर्लिंगम के रूप में की है !

No• 035

आज भी पूरे भारत भर में बारह ज्योतिर्लिंगम का विशेष महत्व  है ! जो महान तीर्थ स्थान  बन  गए  हैं !  जिसको कहते हैं  देवों का भी देव  ”  महादेव  ”   अर्थात्   जिसकी    पूजा   स्वयं देवाताओं ने भी की है  इसलिए  कुरूक्षेत्र के मैदान में आज भी स्थाणेश्वर का मन्दिर है ! जहाँ  दिखाते हैं कि महाभारत युद्ध के पहले श्रीकृष्ण ने भी स्वयं शिव  की  पूजा  की  और  पाण्डवों  से  भी कराई ! उसके बाद हरहर महादेव अर्थात् युद्ध आरम्भ हो गया ! तो श्रीकृष्ण ने स्वयं शिव की पूजा क्यों की ? अगर श्रीकृष्ण  भगवान थे तो  उन्हें  शिव की पूजा नहीं करना था ! इसी तरह रामेश्वरम्  में चले जाओ जहाँ  दिखाते  हैं  कि रावण  से युद्ध करने से पहले स्वयं श्रीराम ने भी शिव की  पूजा की ! श्रीराम  का भी जो ईश्वर है और उसकी पूजा करके उसके बाद हरहर महादेव  अर्थात्  बुराइयों  के  ऊपर सम्पूर्ण विजय प्राप्त करना ! हरहर महादेव अर्थात्  हरना  समाप्त  करना  वा  मिटाना !  महादेव  की  शक्त्ति अर्थात् जो देवों का भी देव महादेव !

                            जिन देवियों की आज हम पूजा करते  हैं , अम्बा , दुर्गा , ये  सब  देवियां  कौन  हैं ? कहा जाता है कि  संसार  में जब असुर  बढ़ गए थे तो शिव ने अपनी शक्त्तियों को  उत्पन्न किया था ! असुर    संहारिणी   शिव   शक्त्तियों   के   रूप   में  आज  भी  उनका गायन करते हैं ! जो  देवों का भी देव , देवियों का  भी  देव वो  है  महादेव !  जिसकी मान्यता  संसार  के सभी आत्माओं  ने स्वीकार की है !

               मुसलमान धर्म में जाओ तो वे लोग मूर्ति पूजा नहीं मानते हैं ! परन्तु जब  वे  मक्का हज पर जाते हैं ! तो वहाँ  काबा  का पवित्र  पत्थर रखा  है   जो निराकार  है ! इसके पीछे  एक कहानी है ! जब मुसलमान  धर्म  में परमात्मा  के विषय  को  लेकर मतभेद  हो गया तो कहा जाता  है   कि  मक्का  में पहले  एक  लाख छियासी  हज़ार  देवीदेवाताओं की मूर्तियां थीं ! लेकिन किसकी  मूर्ति  को  मक्का  में स्थापित  किया जाए , इसको लेकर  के लोगों में विवाद हो गया ! लोग आपस  में झगड़ा  करने लगे और  खूनखराबा  होने   लगा  !  उस   वक्त्त  एक आकाशवाणी  हुई   कि   आप  लड़ाईझगड़ा  मत करो और मुझे इस स्वरूप में याद  करो  ! ऊपर  से वह पवित्र पत्थर गिरा था जिसकी स्थापना मक्का में की गयी और उसी  वक्त्त  सारी  मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया ! तब से लेकर आज तक इस पवित्र पत्थर की इतनी मान्यता है ! इस पत्थर का नाम है संगअसवद ‘ ! मुसलमान लोग मानते हैं  कि जीवन  में  एक  बार  हज  यात्रा  पर  जाकर ,  इस पवित्र  पत्थर  का  दर्शन  अवश्य  करना  चाहिए ! जिस लाईन के बिना उनका हज पूरा नहीं होता है ! वह  लाईन  है– ” हे परवर  दिगार  नूरे इलाही  मेरा हज  कबूल  हो तब उनका  हज कबूल  होता है ! जिसका अर्थ  हैपरवर  दिगार अर्थात्  परमेशवर   नूरे इलाही अर्थात् जो नूर का रूप है जिसको हमने ज्योतिर्लिंगम कहा , उन्होंने  उसे नूर कहा , बात तो एक ही है ! ज्योति  माना  तेज  और  नूर  माना भी तेज , तो बात तो एक ही हो गयी !

No• 036

क्रिशचन धर्म में तो कहा जाता है , जब मोसेस माउण्टेन के ऊपर गया उसको वहाँ  पत्थरों पर दो कमाण्डमेन्ट ( आदेश ) मिले ! वहाँ  उसको अखण्ड   ज्योति  का   साक्षात्कार   हुआ  जिसको देखकर मोसेस ने कहा जेहोवा जिसका अर्थ  है सुप्रीम  लाईट ! इसलिए क्राइस्ट  ने कभी भी अपने आप  को भगवान  नहीं  कहा !  क्राइस्ट  ने  हमेशा यही कहा  गॉड इज लाईट, आई एम द सन ऑफ गॉडअर्थात् ”  God is light ,  I am the son of GOD ” जब उनको क्रॉस पर चढ़ा  रहे  थे  तब भी अपनी अन्तिम प्रार्थना में उसने भगवान से यही विनती की किहे प्रभु !  आप  इन्हें क्षमा कर  देना   क्योंकि  इन्हें पता नहीं  है कि  ये  क्या कर  रहे  हैं ! जिसको  क्रिशचनों  ने लाईट  कहा ,  मुसलमानों ने नूर  कहा , हिन्दओं  ने ज्योति  कहा  वह परमात्मा एक ही  है  या अलगअलग  है !  यह विचार करने की  बात  है  !  आज  भी  विटिकन   सिटी  में  चले  जाओ ,  वहाँ  जो  सबसे  बड़ा  चर्च है , उस चर्च  में परमज्योति  परमेश्वर का  दिव्य  स्वरूप  देखने को मिलता है !  परम प्रकाश , प्रकाशमान स्वरूप , नूर स्वरूप देखने को मिलता है !

      गुरूनानक ने तो बहुत स्पष्ट शब्दों में परमात्मा की व्याख्या  की है ! इतना स्पष्ट किसी और ने नहीं किया एक ओंमकार , निराकार , सतनाम् , निवैर   अकालमूर्त , अजोनि जो निराकार है , जो  निर्वेर है वही  सतनाम् है  जिसको काल  कभी  नहीं  खा सकता है ! जो कभी किसी योनियों में नहीं आते हैं अर्थात्  अजोनी  है  !   महवीर  स्वामी  ने  किसका ध्यान किया ? आज भी दिवाली के दिन , जब  जैन लोग महावीर स्वामी का निवार्ण दिन मानते हैं  तब अपनी प्रार्थना में यही  कहते  हैं – ” आप  ने  जिस शिवधाम को प्राप्त किया वो गति हमें भी प्राप्त हो तो वो शिवधाम कौनसा है ? वो शिव  कौन  है ?  जिसको उन्होंने कहा शिव, शिलापति सर्व श्रेष्ठ  है ! उस गति को प्राप्त करने के  लिए जीवन के  रहस्य में तीन बिन्दु बताएज्ञान , दर्शन और चरित्र ! यही सच्चा तपस्या है , जिसके आधार पर उस श्रेष्ठ गति को प्राप्त कर सकते हैं

                    इसी तरह महात्मा बुद्ध ने कभी मूर्ति पूजा की ओर  प्रेरित  नहीं  किया लेकिन आज भी जापान में चले  जाओ वहाँ तीन फुट दूर बैठ करके एक थाली में लाल पत्थर  रखा  जाता है , जिसको कहते हैं , करनि का पवित्र पत्थर !  उसका नाम है चिंकोनसेकी अर्थात् शान्ति का  दाता !  पारसी धर्म में तो अग्यारी में अखण्ड  ज्योति जलती रहती है ! इसलिए  कहा  जाता  है कि  पारसी  लोग जब ईरान से भारत में आये थे तो जलती हुई ज्योति को लेकर आये थे ! आज  भी उनके यहाँ जब यज्ञ वेदी की  स्थापना  होती  है , जिसको   कहते हैं फायर टेम्पल ” ! अखण्ड ज्योति जलती रहती है

                       किसी ने अखण्ड ज्योत कहा   किसी ने नूर कहा , किसी  ने लाईट कहा , किसी ने  ज्योति   कहा ,  किसी   ने  सिद्ध  शिलापति  कहा   किसी ने चिंकोनसेकी  कहा  तो सर्वधर्म मान्य एक ही यह परमात्मा का परिचय है ! वह निराकार है ! स्वयं हज़ारों  सूर्य से तजोमय  स्वरूप है ,  जिसका वर्णन भगवान ने  अर्जुन को  कहकर  सुनाया !  हे अर्जुन ! स्वरूप की प्राप्ति और शरीर की प्राप्ति में अन्तर है ! में कोई शरीरधारी नहीं हूँ , इसलिए मेरा जन्म इन आँखों से देखा नहीं  जाता !  मैं  अजन्मा  अव्यक्त्त , सदा  शाश्वत् , विनाश  रहित प्रकृति को अधीन  करके योग माया  से प्रगट  होता हूँ अर्थात् मेरा जन्म दिव्य और अलौकिक है !