स्वधर्म , सुख का आधार – तीसरा और चौथा अध्याय

गीता  ज्ञान  का  आध्यात्मिक  रहस्य   ?

   The Great Geeta                          No• 032 

        स्वधर्म ,  सुख  का  आधार        तीसरा    और  चौथा    अध्याय   

             मन को वश में करने के ऊपर बहुत सुन्दर कहानी है ! एक व्यक्त्ति के पास बहुत ही हिष्टपुष्ट घोड़ा था !  लेकिन कोई उस घोड़े को वश नहीं कर पाता था !  कई  राज्यों से  गुज़रते हुए वह जब एक राज्य में  आया  तो राजा  को खबर मिली  कि एक बहुत  ही  हिष्टपुष्ट  घोड़ा  है  लेकिन  वश  में नहीं होता ! जो  उसको  वश में करेगा  उसको वो  घोड़ा फ्री  में  मिल  जाऐगा ! राजा  ने  ऐसे  ही  एक  भरे मैदान  के अन्दर  अपने  उस्तादों  को  बुलाया और कहा कि जो घोड़े  को  वश में करेगा उसको  राजा की तरफ से भी इनाम  मिलेगा !  कई उस्ताद आये उसको  वश  में  करने  के  लिए ,  लेकिन  जैसे  ही नज़दीक जाते थे वो उछालकर के फेंक देता था या सामने से आक्रमण कर देता था ! घोड़ा वश में नहीं हो रहा था ! सारे  उस्ताद जब फेल हो गये घोड़े को वश  करने  में  तो राजा उदास  हो  गया  कि हमारे राज्य  में ऐसा  कोई  नहीं  है , जो  घोड़े को वश  में कर  सके  !   राजकुमार   काफी   देर   से   बैठकर  देख रहा था यह सारा  दृश्य ! उसने राजा  से  कहा अगर मुझे  अनुमति  दें तो  मैं  इस  घोड़े को वश में करना चाहता हूँ ! मुझे अपने में विशवास है ! राजा की  अनुमति  मिलते  ही , राजकुमार  ने  देखा कि घोड़े को ऐसी दिशा में खड़ा  किया गया था ,  जहाँ से उसकी परछाई  लम्बी  दिखती  थी !  जैसे  कोई व्यक्त्ति आगे से या पीछे आता था घोड़े को वश  में करने  के  लिए ,  तो  उसकी  परछाई  को  देखकर घोड़ा  भड़क  उठता  था !  इसलिए  पीछे से  अगर कोई  जाता था  तो  पीछे  लात  मार  देता था और आगे से कोई जाता  था तो उस पर टूट  पड़ता था ! सर्वप्रथम   राजकुमार  ने   क्या  किया  ? धीरेधीरे घोड़े  की  दिशा  को  बदली  किया !  इस  तरह  से बदली किया  कि घोड़े की परछाई  भी पीछे  गिरे ! जो आये उसकी परछाई भी पीछे  गिरे !  फिर पीछे से जाकर इस घोड़े  को  वश में  कर लिया !  सबसे पहले उसकी  लगाम  अपने हाथ  में ली और घोड़ा वश में हो गया !

                              इसलिए भगवान ने अर्जुन को यही  विधि  बतलाया ! तुम आत्मा इतनी श्रेष्ठ और शक्त्तिशाली हो , इतनी बलवान हो ,  कि मन रूपी घोड़े  को वश  में करने के लिए सबसे पहले उसकी दिशा बदलना ज़रूरी है !  आज  जिस दिशा में हम अपने मन को खड़ा कर रखें हैं  ! उससे  मन  कभी वश  में नहीं होगा ! वो  कौनसी  दिशा  में  है  कि जहाँ परछाई गिरती है , आशायें , तृष्णायें , इच्छायें ये  सारी परछाई  हैं ! जिसको  प्राप्त  करने  में  मन लगा  हुआ  है !  जितनी  इच्छायें ,   तृष्णायें  उसके सामने हैं   उतना  वो  भड़कता रहता  है ,  उछलता रहता है , कूदता  रहता है , भ्रमण  करता  रहता  है इसलिए  सबसे   पहले   इस  घोड़े  की   दिशा  को बदलना  आवश्यक है !  आध्यात्मिकता  हमें  यही समझ देती है  कि किस  प्रकार  हम अपने मन की दिशा को परिवर्तन  करें !  एक सकारात्मक  दिशा की ओर उसका खड़ा करें ! उसके बाद इन्द्रियों को अनुशासित करें ! फिर  उसके ऊपर सवार हो जायें   बुद्धि  की  लगाम हाथ  में  खींच  लो तो मन  रूपी घोड़ा वश में हो जायेगा !

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