ईश्वर से दो गिफ्ट मिलती है

No• 046     परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग         पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

               इंसान का जब जन्म होता तो ईश्वर से उसको दो गिफ्ट मिलती है ! सबसे पहली गिफ्ट मिलती है , विवेक युक्त्त बुद्धि ! जो सही और गलत को समझ सकती है ! आज एक छोटे बच्चे के आगे भी आप झूठ बोलकर देखो , वो बच्चा तरन्तु आप से कहेगा , आपने झूठ बोला ना ! लेकिन उस वक्त्त उसको हम क्या कहते हैं ! चुप बैठ , तू समझता नहीं है और जितनी बार हमने उसको कहा चुप बैठ समझता नहीं है तो उतनी बार हमने उसके विवेक को मारा ! जब विवेक को ही मार दिया तब वो सोचता है कि यही सच है ! झूठ बोलना यही वास्तविकता है ! इसलिए वो भी झूठ बोलना प्रारम्भ कर देता है ! जब वो झूठ बोलता है , तब हम कहते हैं झूठ बोलता है , कहाँ से सीख  कर  आया ?  कहता है खुद से तो सीखा हूँ ! कैसी मनुष्य की विचारधारा है , कैसी उसकी सोच है ! अगर कभीकभी साक्षी होकर के दृश्य को देखें ना तो हंसी भी आती है कि मनुष्य कितनी अज्ञानता वश चलता है ! जीवन में कर्म करता है ! जबकि  भगवान  ने  उसको  विवेक  युक्त्त  बुद्धि  दी  है !

            दूसरी गिफ्ट स्वतंत्रता की दी ! ये दो गिफ्ट ईश्वर से  प्राप्त कर आत्मा इस  संसार में आती है ! जिस  विवेक युक्त्त बुद्धि  से  सही  क्या  है , गलत क्या है , इसको पहचान सकती है !  फिर  स्वतंत्रता जो उसके पास है , उसके आधार पर क्या करना है , क्या नहीं करना है , उसके   लिए वह  खुद  स्वतंत्र है !  उसके  लिए   कोई   ज़िम्मेवार  नहीं  है !  जब मनुष्यात्मा  के  ज्ञान  पर  अज्ञानता  का पर्दा  पड़ जाता है , तब  वो  मोह , माया  में  उलझकर अपने निज  स्वरूप  को भूल जाता है और परमात्मा  को ही अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी  समझने  लगता है ! जीवन में ये महानतेमहान अज्ञानता है ! यही सबसे बड़ा अज्ञान है !  भगवान ने यही बात अर्जुन को समझायी है ! इस रीति से आत्मज्ञान द्वारा  यह अज्ञान  नष्ट  होता  है !  इसलिए पहले  भी  बताया गया  है   कि  जीवन   में   आध्यात्मिक   ज्ञान  की आवश्यकता   क्यों  है  ?  आध्यात्मिक  ज्ञान   की आवश्यकता इसलिए  है , क्योंकि  वही अज्ञान को न्यूट्रालाईज़ करके खत्म करता है ! जब आत्मज्ञान द्वारा अज्ञान नष्ट हो जाता है , तब  सभी  बातें स्पष्ट समझ  में आने  लगती  हैं !  जैसे सूर्य की रोशनी में हर चीज़ स्पष्ट दिखाई देती है ! ऐसे ज्ञान भी रोशनी है ! जब ज्ञान की रोशनी बुद्धि को प्राप्त होती है तो हर चीज़ सही स्वरूप में नज़र आने लगती है !

No• 047     परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग         पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

           आगे भगवान ने कहा कि इन्द्रियों के विषय से उत्पन्न सुख , ये आदि , मध्य और अन्त के दुःख का कारण  है ! जो  मनुष्य  काम , क्रोध से उत्पन्न वेग ( Pressure ) को सहन कर , उससे मुक्त्त हो जाता है वह समर्थ आत्मा है ! वही सच्चा योगी है ! वह  अपने  मन  और  बुद्धि को परमात्मा में स्थित कर  सकता  है ,  श्रद्धा  से  उनकी  शरण  में  चला जाता है , उसकी  सर्व के  प्रति सम  दृष्टि  हो जाती है ! इसलिए संसार में  रहते जो मोह  रहित , संशय रहित  है , वह   जीवन   मुक्त्त  है  !  वह   मन  की एकाग्रता  द्वारा  असीम  सुख  का   अनुभव  करने लगता है ! जीवन मुक्त्त इसलिए कहा जाता है  कि मुक्त्ति से भी श्रेष्ठ है जीवन मुक्त्त स्थिति !

                  एक है , मुक्त्त हो जाना ! इस शरीर से मुक्त्त  हो  जाना  और  परमात्मा  के धाम  में  चले जाना !  ये   मुक्त्ति  की  अवस्था   है !  मुक्त्ति  की अवस्था  का  अनुभव  कभी  होता नहीं  है , जीवन मुक्त्ति इसलिए श्रेष्ठ है ! उदाहरण  के तौर पर जैसे व्यक्त्ति  जब सो जाता है और  जब गहरी  नींद  में सोया होता है ! जिस वक्त्त वो सोया है , उस  समय उसको अनुभव नहीं है ! लेकिन  जब वह उठता है , तब कहता है आज  बड़ी गहरी नींद आयी  !  जिस वक्त्त  वो सोया  हुआ था , उस वक्त्त अनुभव  नहीं था ! उठने के बाद उसने अनुभव किया ! ठीक इसी प्रकार जब व्यक्त्ति मुक्त्ति की अवस्था में , ये शरीर छोड़कर  मुक्त्ति  में  चला  जाता  है  !  मुक्त्ति  की अवस्था  में  तब  उसको , कोई अनुभव  नहीं  होता है  !  लेकिन  जीवन  में  हैं  और   वहाँ  मुक्त्ति  का अनुभव  करें  ! इसलिए  कहा  मुक्त्ति  से  भी  श्रेष्ठ जीवनमुक्त्ति है ! मुक्त्ति  की कामना  नहीं लेकिन जीवन  में  रहते  मुक्त्ति  का  अनुभव  करके  देखो कितना श्रेष्ठ है !

 आगे जीवनमुक्त्ति का बहुत सुन्दर  उदाहरण  दिया  गया है ! आशा है कि आप उसका लाभ लेंगे !

No• 04-    परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग         पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

                    भगवान अर्जुन को ध्यान की प्रक्रिया बताते हैं कि हे अर्जुन ! बाहर के विषयों , दृश्यों का चिंतन  नहीं  करो ! अपने  अंतर्चक्षु  को भृक्रुटी  के बीच स्थित करो ! क्योंकि  यही आत्मा  का अनादि स्थान है ! मेडिकल  साइंस में  इस बात का उल्लेख है कि हाइपोथैलेमस  और पिटयूटरी  ग्लैंड के बीच में आत्मा  का निवास  है , जो  एकदम  भृक्रुटी  के मध्य में स्थित है !

                            इसलिए मनुष्य मन्दिर में जाता है , तो आत्मस्वरूप  का भाव  प्रगट करने  के लिए वो तिलक  लगाता है ! भारत  में प्रथा है कि मन्दिर में  जब  जाते  हैं  तो  चमड़े  की   चीज़  को  बाहर उतारते हैं , फिर  अन्दर  जाकर  के तिलक  लगाते हैं ! यहाँ ही क्यों लगाया ? क्योंकि  वहीं आत्मा का निवास स्थान है ! उसके  बाद  भगवान की मूर्ति के आगे हाथ  जोड़कर  के  नमन  करते  हैं  ! ये  प्रथा चलती आई  है ! परन्तु  उसके पीछे  का भाव कभी किसी  ने नहीं  समझा की  चमड़ें  की  ही चीज़ को बाहर  क्यों  उतारा  !  वो   चमड़ा  तो   उतार  दिया लेकिन  वास्तव  जो देह अभिमान  रूपी चमड़ा को बाहर  उतारने  की  बात  है  !  फिर  अन्दर  आकर के तिलक लगाया माना  स्वयं को  देह नहीं आत्मा समझा !

             मैं एक शुद्ध पवित्र आत्मा हूँ इस भाव को विकसित  करो  ! फिर  भगवान  की मूर्ति  के आगे जाकर के हे प्रभु !  मैं फलाना  आपको  नमन नहीं कर  रहा  हूँ , लेकिन  मैं  आत्मा  आपकी  सन्तान आपको  अपनी  भावनायें   अर्पित  कर  रहा  हूँ  ! कितना  सुन्दर  भाव  है  ये ! लेकिन क्या कभी हम इस  भाव  के साथ में गए ? नहीं , तो आज के बाद हमें इस भाव को विकसित करना चाहिए ! भगवान ने इसलिए  इस  भाव  को विकसित  करने के लिए अर्जुन को कहा कि बाहर के दृश्यों और विषयों का चिंतन नहीं करो ! जब भी मेडिटेशन में बैठो , ध्यान  में  बैठो , परमात्मा के सम्मुख बैठो तो  उस  समय बाहर के विषयों और दृश्यों का चिंतन  नहीं  करो ! लेकिन   अपने    अंतर्चक्षु   को  फालना  व्यक्त्ति , फालना   कारोबार ,  फालना  काम  रह  गया ,  ये सोचने  के  बजाय  जब  वहाँ  पर  बैठ हो  तो  सब चिंतनों को बंद करके स्वयं के अंतर्चक्षु  को भृक्रुटी के बीच  में  स्थित   करो अर्थात्  स्वयं  को  आत्मा निश्चय करो , मन को शान्त करो और परमात्मा के ध्यान   में  बुद्धि  को  एकाग्र   करो   तथा   सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति कल्याण की  कामना को प्रवाहित कर  ,  सांसारिक   दुःखों  से    छुटकारा   दिलाकर परमशन्ति  को  प्राप्त  कर  लो ! ये ध्यान की  सही विधि  है  !  हम   जितनी   अच्छी   भावनाओं   को प्रवाहित  करेंगे , संसार  में  उतनी  ही  ये  भावनायें वापिस   आयेंगी  !  जैसे  ही  आप  भावनाओं  को फैलाते हैं , वहीं  भावनायें  पुनः आपके  पास  लौट कर  आयेंगी , क्योंकि ये अनादि  कर्मों का सिद्धांत है ! इसका  एक बहुत  सुन्दर  उदाहरण  को अगले अध्याय में  वर्णन करेंगे !

    No• 050    परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग       पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

                  जैसे भावनाओं को या तरगों को आप अन्दर छोड़ते हैं , तो वो तरंग फिर वाइब्रेट होकर आपके पास आ जाती है ! ऐसे अगर हम निगेटिव तरगों को छोड़गे तो वही तरंगे हमारे पास वापिस आयेंगी , जो हमारी मानसिक शान्ति को भगं कर देंगी ! इसलिए जितना हो सके उतने शुद्ध तरंगों को फैलाओ ! एक बहुत ही सुन्दर कहानी है कि किस तरह वो तरंगें हमारे पास वापिस आती हैं !

           एक राजा था ! उसका एक मित्र था , जो लकड़ी का व्यापारी था ! दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती थी !  एक दिन वो लकड़ी का व्यापारी अपने गोदाम में गया ! सारा स्टाँक देखतेदेखते चंदन की लकड़ी के पास आया और देखा इतना सारा चंदन की लकड़ी पड़ी हैं ! उसका बिज़नेस माइंड चलने लगा कि कितने पैसे  मेरे इसमें रूके हुए हैं ! अब ये पैसे निकलेंगे कैसे ? इतनी लकड़ी कौन खरीदेगा ? बिना मतलब का इतना चंदन की लकड़ी को क्यों खरीद लिया ? ऐसे विचार चलने लगे ! फिर उसके मन में विचार आया कि अगर कोई मरता है तो क्योंकि मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति ये है कि मन में पहले निगेटिव विचार आता है ! उसके मन में विचार आया कि साधारण व्यक्ति मरेगा तो इतनी सारी चंदन की लकड़ी जलाने के लिए लेकर नहीं जायेगा ! कोई बड़ा व्यक्त्ति मरेगा तो उसको जलाने के लिए तो चंदन की ही लकड़ी लगायेंगे !

               बड़ा व्यक्त्ति कौन है ? राजा के सिवाय तो कोई और बड़ा व्यक्त्ति है नहीं ! राजा उसका दोस्त था , मित्र था फिर भी लोभ लालच जहाँ आयी वहाँ मित्र को भी नहीं देखते ! फिर उसके मन में विचार आया कि राजा की तो अभी उम्र ही नहीं है मरने की ! तो कैसे वह मरेगा ? अगर कोई आसपास के प्रदेश वाले चढ़ाई करें , तब तो राजा मर सकता है ! लेकिन फिर विचार आया कि आसपास के सभी प्रदेश वालों के साथ राजा की अच्छी दोस्ती है ! तो कोई उसके ऊपर चढ़ाई करने वाला भी नहीं है ! विचार आया कि यदि कोई उसको खत्म कर दें , तब तो वो मर सकता है ! लेकिन खत्म कौन करेगा , सभी प्रजा उससे इतनी सन्तुष्ट है , इतनी खुश है कि कोई उसके खत्म क्यों करेगा ? फिर उसके मन में विचार आया कि मैं ही उसको खत्म कर दूं !  तो उसको जलाने के लिए चंदन की लकड़ी यूज़ होंगी ! मैने यदि अगर राजमहल में कहीं उसको मारा तब तो मुझे पकड़ लेंगे और मुझे सजा हो जायेगी ! हाँ , जब मैं राजमहल में राजा के साथ जाता हूँ या कहीं बाहर भी जाता हूँ तो किसी को मेरे ऊपर शक होगा ही नहीं , क्योंकि सभी जानते हैं कि हमारी दोस्ती अच्छी है !

विचार कीजिए , व्यक्ति के विचार एक के बाद एक उसको कहाँ तक पहुंचा देते हैं ! लेकिन राजा को मारने की हिमम्त उसमें थी नहीं ! जब हिमम्त ही नहीं थी , तो वह क्या करेगा ? विचार चलते रहे कि राजा मरे तो कैसे मरे ! राजा मरे तो कैसे मरे …….ताकि मेरे चंदन की लकड़ी खत्म हो जायें