कर्मों की गृह्य गति

No• 039     परमात्मअवतरण एवं कर्मयोग  – पाँचवां और छठा अध्याय   

               कर्मों की गृह्य गति 

                  

परमात्मा अर्जुन को यहाँ पर कर्मों की गृह्य गति के बारे में बताते हैं कि जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को देखता है तो वह बुद्धिमान   योगी है।”  अकर्म  में कर्म को देखना इसका भावार्थ  यह है कि अकर्म हमने जो किया अर्थात् फल खाया । यह  अकर्म  हुआ  इसका कोई दूसरा फल नहीं मिलेगा ! अगर  उसमें भी कोई  श्रेष्ठ  कर्म करे अर्थात् उस बीज को पुनः धरती में डाल कर के बोयें ये है अकर्म में कर्म को देखना अर्थात् वो बुद्धिमान है !                                  

ऐसे जीवन में जो श्रेष्ठ कर्म करता है और उसके फलस्वरूप अकर्म भी करने लगता है , लेकिन  उस  अकर्म  में पुनः श्रेष्ठ कर्म करने  की  क्षमता जिसके  अन्दर है !  

साधारणतः हम सभी  लोग क्या करते  हैं ?  फल खाकर बीज को फेंक देते हैं ! हमने अकर्म में कर्म को नहीं देखा लेकिन  जो  व्यक्त्ति पुनः  उस  बीज  को  बोता  है तो पुनः उसको  हजारों फल की  प्राप्ति  होती  है !  साधारणतः  हम क्या करते  हैं  कि मैने  जो  कर्म किया उसका फल  मिला ,  मैने उसको स्वीकार किया और सन्तुष्ट हो गये ! उसी कर्म में आगे कर्म करने की प्रेरणा हम नहीं प्राप्त करते हैं ! बुद्धिमान योगी  जो होता है , वह  ऐसे अकर्म में भी कर्म को देखना आरम्भ   करता है !  जिसको  कर्मों  का आरम्भ और फल की प्राप्ति में कामना  का त्याग है तथा वह सांसारिक आश्रय  रहित  हो गया है ! परमात्मा  की याद  में नित्य तृप्ति है , उसके  कर्मों में कोई त्रुटि नहीं होती है ! वह  ज्ञान रूपी अग्नि से विकर्म अर्थात्  विकृत कर्म जो हुए हैं , उसको भी भस्म कर देते हैं ! जो विकारों  के वश किया गया कर्म  है  उसको  भी भस्म  करने की क्षमता वह रखता है !                     ये कर्मों की गृह्य गति को भगवान ने अर्जुन को समझाया और फिर  आगे कहते  हैं  कि जिसने शरीर  की इन्द्रियों और अंतःकरण को वश किया हुआ है , वह शरीर  सम्बन्धी कर्म करते  हुए भी कर्म के बन्धन में  नहीं बंधता है ! जो ईर्ष्या  से परे , द्वंदों  से  रहित , सफलता व  असफलता  में समान है , जो  संगदोष  की असक्ति से रहित  है ! अभिमान से मुक्त्त है , जिसकी बुद्धि ज्ञान स्थिर  है और सदा सन्तुष्ट आत्मा है  वह यज्ञ अर्थात् ईश्वर निमित्त होकर कर्म करता है उसके सब पूर्व विकर्म दग्ध  हो जाते हैं ! ये उसके गुण हैं कि हम कैसे पुराने विकृत कर्म को दग्ध कर सकते हैं ?

No• 040     परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग   –   पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

                कई बार लोग कहते हैं कि हमें दूसरों के लिए ईर्ष्या  नहीं है ! लेकिन  लोग  हमारे लिए ईर्ष्या करते हैं तो क्या किया जाए ? जो  ईर्ष्या  से  परे  है   वो द्वंदों से अतीत है ! जहाँ ईर्ष्या होती है , वहीं द्वंद्व आरम्भ हो जाता है ! मुझे किसी के लिए ईर्ष्या नहीं है ! लेकिन दूसरा जब मेरे  प्रति ईर्ष्या करता है , तो अन्दर  द्वंद्व (Duality) चलता  है ! तब अपने  मन को कैसे  शान्त  रखें ?  लेकिन यहाँ  पर सोचने की बात है कि ईर्ष्या कब उत्पन्न होता है ?  जब किसी भाग्य बहुत सुन्दर होता है तो उसको देखकर के ही लोग  ईर्ष्या  करेंगे ! अब मैने जो भाग्य प्राप्त किया उसे  मैने  अपने  कर्मों से  प्राप्त  किया , उससे  जो भाग्य मैने प्राप्त किया उसके  प्रति यदि  कोई ईर्ष्या करता है , ईर्ष्या के वश उल्टीसीधी  बातें करता है मेरे विषय में , तो उसके  ईर्ष्या  करने से और  उल्टी सीधी  बात  करने  से क्या  मेरा भाग्य  परिवर्तन हो जाएगा ? जो भाग्य हमने अपने कर्मो  से बनाया है  उसको  मिटाने  की ताकत  किसी की भी  नहीं है ! स्वयं भगवान भी उस भाग्य को मिटा नहीं सकते हैं फिर इंसान  की क्या सामर्थ्य  है ? अगर मिटाने की ताकत है तो  किसी और में  नहीं , सिर्फ मेरे  में है ! किसी के  ईर्ष्या  करने  से  मेरा  भाग्य  मिटने वाला नहीं है यह याद   रखो ! निश्चिंत  रहो ! द्वंद्व  में  नहीं आओ कि  ये ऐसा  बोल रहा है ! ये  वैसा बोल रहा है  ये  ऐसा  कर  रहा  है  !  ये  वैसा  कर  रहा  है  ! इसलिए  मेरे भाग्य  पर प्रभाव पड़ रहा है…. नहीं ! किसकी  बोलने  पर कोई  प्रभाव नहीं  पड़ता ! जो भाग्य  हमने , अपने  कर्मो  से  प्राप्त किया  है , वह किसी  इंसान  की  ताकत  नहीं , जो  उसको खत्म कर सके !

            वह जब खत्म होते हुए दिखाई देता है , तो उसको  खत्म करने  की  शक्त्ति  सिर्फ और  सिर्फ मुझमें  है ! वो  मैं  कैसे  खत्म  करता  हूँ ?  किसके उल्टेसीधे बोल के आधार  से , जब  मैं अपने मन में नकारात्मक  भावनाओं  को  उत्पन्न  करता  हूँ   नकारात्मक विचारों को क्रियेट ( create ) करता हूँ और उस नकारात्मक विचारों की रचना करने से जो कर्म हमने आरम्भ किए , उसी  से  वो भाग्य की लकीर  लगने   लगती  है !  मेरे अपने  विचार  जब गलत शुरू हो जाते हैं , निगेटिव जब चलने शुरू हो जाते हैं , तब  हम  उसको  लकीर  लगाना  आरम्भ करते  हैं  ! इसलिए  हमें  अपने  विचारों  पर  बहुत ध्यान देना है ! क्योंकि जैसा आप सोचेंगे वैसा आप करेंगे ! विचारों के आधार पर ही व्यवहार होता है ! विचारों के आधार से ही भावनायें जागृत होती  हैं ! यदि विचार गलत हो गये तो भावनायें भी गलत हो जायेंगी  ! भावनायें गलत हो गयीं तो व्यवहार गलत होंगे ! यह  गलत  व्यवहार  हमारे भाग्य को लकीर लगाना आरम्भ  कर देता है ! बाकि किसके बोलने से मेरा भाग्य बदल नहीं सकता !

                    इसलिए आप निश्चिंत रहो , द्वंद्व में नहीं आओ ! मुझे तो किसी के प्रति ईर्ष्या नहीं है , लेकिन जब दूसरों को मेरे  प्रति ईर्ष्या आती  है तो मैं  क्या  करूँ  ? आप निश्चिंत  रहो , किसी  आत्मा की  ताकत  नहीं   है ,  आप  के  भाग्य  को  मिटाने की ! हमें  अपने  विचारों  के  ऊपर  बहुत अटेन्शन देना  है  !  जितना  नकारात्मक  विचार  हम  करेंगे उतना  हम अपनी आंतरिक  परेशानियों को बढ़ाते हैं !

No• 041¢ᄂᆰरमात्मअवतरण एवं कर्मयोग?    पाँचवां और छठा अध्याय   

                          जितना ज्ञानयुक्त्त बातों को जीवन में अपनायेंगे उतना  हमारा मन और बुद्धि  तेज  होती जायेगी ! उसकी शक्ति और क्षमता बढ़ने लगेगी ! इसलिए व्यर्थ की बातों को मन में पकड़कर नहीं रखो ! अर्जुन ने भगवान से और  महत्त्वपूर्ण  प्रशन पूछा कि  सभी यज्ञों में श्रेष्ठ यज्ञ कौन सा है ?

            भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! सर्व यज्ञों में ज्ञान  यज्ञ अति श्रेष्ठ है !  ज्ञान का मनन चिंतन करो ! इससे  हमारी बुद्धि में शक्त्ति  आयेगी ! क्योंकि ज्ञान में शक्त्ति है तो सभी यज्ञ में ज्ञान यज्ञ अति श्रेष्ठ है  

ज्ञान माना समझ , समझ से जब हम अपनी आत्मा के शुद्धिकरण के प्रोसेस में लगते हैं तो उससे परम कल्याणकारी और कोई नहीं है ! क्योंकि महान आत्मायें भी ज्ञान नैया द्वारा ही संसार सागर को पार कर लेते हैं जिस प्रकार अग्नि ईधन को भस्म कर देती है , वैसे ही ज्ञान में वो शक्ति है जो विकर्मो को भस्म कर देती है ! सर्व विकर्म और साधनों की आसक्ति और मोह को समाप्त कर ज्ञानयोग की परिपक्व अवस्था से ही आत्मा शुद्ध और पवित्र बन जाती है ! ज्ञान में वो शक्ति है, जो आत्मा के सर्व पूर्व विकर्म को दग्ध कर सकती है और हमारी परिपक्व अवस्था बना सकती है और आत्मा को पवित्र बनने की विधि बता सकती है !

        भगवान ने आगे कहा कि जिसने इन्द्रियों को संयमित कर, वासनाओं को जीता है , साधनों में असक्ति नहीं है  तथा परमात्मा में श्रद्धा विशवास है , वही ज्ञान की पराकाष्ठा को प्राप्त कर सकता है अर्थात् सर्वोच्च स्थिति को प्राप्त कर लेता है ! ज्ञान मार्ग में पुरूषार्थ में अग्रसर होकर के परम शान्ति को प्राप्त कर लेता है

विवेकहीन, श्रद्धा रहित, संशययुक्त आत्मा पुरूषार्थ के मार्ग से भ्रष्ट हो जाती है ! इसलिए कहा जाता है– ” संशय बुद्धि विनश्यन्ति जो विवेकहीन हैं , श्रद्धा रहित हैं , संशययुक्त आत्माएं हैं , वे पुरूषार्थ के मार्ग से भ्रष्ट हो जाते हैं और परमसुख की अनुभूति से वंचित  हो जाते  हैं !  

इसलिए हे धनंजय  ! परमात्मा के प्रति समर्पण भाव से और कर्मयोग की विधि से तथा ज्ञानयुक्त विवेक की तलवार से, अज्ञान से उत्पन्न संशय को नाश कर समत्व भाव से कर्म करो , तो सर्व प्रकार के बन्धनों से मुक्त्त हो जाओगे  ! ये  समपर्ण  भाव  विकसित  करने की प्रेरणा भगवान ने अर्जुन को दी और इस तरह से यहाँ पर चौथा अध्याय समाप्त हो जाता है !

No• 042     परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग         पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

                पाँचवे अध्याय में भगवान बताते हैं कि सन्यास योग और कर्मयोग में क्या अन्तर है ? ज्ञानी पुरूष दिव्य ज्ञान की अग्नि से शुद्ध होकर बाहरी रूप से सारे कर्म करता है ! किन्तु अन्तर में उस कर्म के फल का परित्याग करता हुआ शान्ति , विरक्त्ति , सहनशीलता , आध्यात्मिक दृष्टि तथा आनन्द की प्राप्ति कर लेता है !

            यहाँ पर पुनः अर्जुन एक प्रशन पूछता है कि सन्यास योग और कर्मयोग में क्या अन्तर है ? भगवान उसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि सन्यास का मतलब ये नहीं कि घरगृहस्थ का सन्यास कर दें , कोई ज़िम्मेवारियों का सन्यास कर दे , कोई अपने कर्तव्य का सन्यास कर दे , नहीं ! उसको सन्यास योग नहीं कहा जाता है ! सन्यास योग और कर्मयोग दोनों ही श्रेष्ठ है क्योंकि दोनों ही जैसे एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं ! जो मनुष्य कर्म करता हुआ किसी के साथ न द्वेष करता है और न किसी कर्मफल की इच्छा रखता है वह सदा सन्यासी जानने योग्य है !

          व्यक्त्ति को बांधने वाले या मुक्त्त करने वाले उसके कर्म नहीं हैं , बल्कि उसके कर्म करने की वृत्ति है कि कौनसीवृत्ति से वह कर्म किया गया है ! द्वेष , वैर , लोभ , कामना आदि विकारों का त्याग ही सन्यास है ! कर्तव्य , कर्मों का त्याग करना ये कोई सन्यास नहीं है ! इसलिए कई बार हमें उदाहरण में यह जानने को मिलता है कि एक बार एक सन्यासी सब कुछ सन्यास करके अपने शिष्य के साथ एक हाथ में कमण्डल लेकर के आगे जा रहा था ! अचानक उनके मन में विचार आया कि ये शिष्य का बंधन भी क्यों चाहिय ? इसलिए उसने शिष्य को कहा कि तुम अपने मार्ग पर आगे बढ़ो और मैं अपने मार्ग पर आगे बढ़ता हूँ ! अब दोनों के बीच में कमण्डल एक ही था ! अब कमणडल में बुद्धि जाती है कि कमणडल कौन लेगा ? उस पर उन दोनों की बहस आरम्भ हो गयी कि कमण्डल का क्या करें ? आखिर उन दोनों ने फैसला किया कि कमण्डल को भी तोड़कर आधाआधा ले लें ! इसका भावार्थ है कि आप सब कुछ त्याग करते हो , लेकिन उसकी वृत्ति के अन्दर सन्यास नहीं है , तो कोई फायदा नहीं है ! इंसान कर्म कोई भी करे लेकिन उस कर्म के अन्दर वैर , द्वेष , लोभ , कामना आदि विकार नहीं होना चाहिए ! इन वृत्तियों से जिसकी बुद्धि परे हो जाती है , वही सच्चा सन्यासी है , भले ही वह गृहस्थ में रहता हो , तो भी वह सन्यासी जानने योग्य है !

No• 043     परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग         पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

                          भगवान ने फिर आगे बताया कि कर्मयोग के बिना सन्यास की प्राप्ति नहीं हो सकती है ! जो योगयुक्त्त और पवित्र आत्मा है , जो सर्व प्राणियों में आत्मा को देखता है , आत्मिक दृष्टि का अभ्यास करता है , वह इस शरीर को नहीं देखता है कि ये फलाना है , ये फलानी है ! लेकिन हर एक में विराजमान आत्मा को देखता है ! आत्मा को देखते हुए उसका मन वश में होता है ! जब शरीर को देखता है कि ये काला है , ये गोरा है , ये ऊंचा है , ये नीचा है तो उसके अन्दर अनेक प्रकार के भाव आने लगते हैं तो मन वश में नहीं रहता है ! मन को वश करने की सहज विधि बतायी है कि तुम सबमें आत्मा को देखो ! ऐसे वह जितेन्द्रिय, सर्व कर्मेन्द्रिया द्वारा कर्म करते हुए भी स्वयं को उससे भिन्न समझता है  शरीर मात्र एक साधन है ! जो व्यक्त्ति अनासक्त्त भाव से अपना कर्म करता है और उसका सभी फल परमात्मा के प्रति समर्पित कर देता है , वह कर्म करते हुए भी कर्म बन्धन से अलिप्त रहता है ! जिस प्रकार कमल जल से अलिप्त रहता है वैसे कर्मयोगी  का  हर  कर्म  आत्मशुद्धि  के  लिए  होता है ! वह पुरूष ( आत्मा ) नौ द्वार वाले इस देह में रहते हुए मन , बुद्धि संस्कार पर अपना नियंत्रण करते हुए परम शान्ति एवं परम सुख का अनुभव करता है ! जैसे कमल जल में रहते अलिप्त ( detachment ) रहता है , ऐसे संसार में रहते हुए भी वह अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाता है 

             राजा जनक ने एक बार सवाल किया कि जीवनमुक्त्ति स्थिति किसको कहते हैं ? मुझे वो ज्ञान कोई एक सेकण्ड में दें ! कई विद्वान आये , राजा जनक को ज्ञान सुनाने के लिए लेकिन जैसे ही वे ज्ञान देना आरम्भ करते तो राजा जनक कहते कि मुझे ज्ञान नहीं चाहिए ! मुझे प्रैक्टिकल में कोई एक सेकण्ड में बतायें कि जीवनमुक्त्त स्थिति किसको कहते हैं ! आखिर जब सभा शान्त हो गई , तो राजा जनक भी निराश हो गए और कहा कि मेरे विद्वानों में कोई भी ऐसा नहीं जो जीवनमुक्त्त स्थिति को बता सके ! तभी वहाँ अष्टावक्र प्रवेश करते हैं ! अष्टावक्र जैसे ही आगे बढ़ते हैं ज्ञान सुनाने के लिए , तो सारी सभा उस पर हसनें लगती है ! उस समय अष्टावक्र ने राजा से कहा कि हे राजन ! मैं तो समझता कि तुम्हारे दरबार में विद्वानों की सभा है , लेकिन आज मुझे पता चला कि ये तो चमारों की सभा है ! सारे विद्वान एकदम गुस्से में आ गए कि हमें चमार कहा, अष्टावक्र ने कहा कि ये विद्वान मुझ आत्मा को नहीं देखते हैं कि ये आत्मा कितनी ऊंच हो सकती है ? वो  मेरी चमड़ी को देख रहे हैं इसलिए हंस रहे हैं !

                    यही बात यहाँ पर कही गई है कि हे अर्जुन ! सबमें आत्मभाव को देखो , आत्मरूप को देखो , उसकी चमड़ी को नहीं देखो ! क्योंकि चमड़ी को देखने से अनेक भाव उत्पन्न होंगे ! अष्टावक्र ने राजा से कहा कि आपको एक सेकण्ड में ज्ञान चाहिए ना ? मैं आपको अभी ज्ञान नहीं दूंगा , समय आने पर ज्ञान दूंगा ! सभा विसर्जित हुई राजा ने अपना घोड़ा मंगवाया कि थोड़ा बाहर सैर कर के आते हैं ! जैसे ही घोड़ा आया और राजा ने एक पैर घोड़े पर रखा और एक पैर उनका जमीन पर था ! दूर से अष्टावक्र ने राजा को आवाज़ दी कि हे राजन ! इस वक्त्त तुम कहाँ हो ? राजा सोच में पड़ गया कि ज़मीन  पर  होते  हुए  ज़मीन  पर  नहीं  हूँ , घोड़े  पर  होते  हुए  भी  घोड़े  पर  नहीं  हूँ ! अष्टावक्र  कहते  हैैं  कि  यही  तो जीवनमुक्त्ति  का   रहस्य  है  कि  संसार  में  रहते  हुए  संसार  से अलिप्त ( detachment)  रहो ,  ये  सही मार्ग है जीवनमुक्त्ति की अनुभूति करने का ! मुक्त्ति से भी श्रेष्ठ , जीवनमुक्त्ति को माना गया है !

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