परमात्म-अवतरण एवं कर्मयोग

No• 052     परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग         पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

                                 छठवें अध्याय में ध्यानयोग की विशेषता को बतलाते हुए भगवान योग , उसके अभ्यास  और  उसकी  सही  विधि  का स्पष्टीकरण करते  हैं ! मन  को  किन  कठिनाइयों  का  सामना करना  पड़ता  है , ध्यान  से  परमात्मा  में  मन  को एकाग्र  कैसे  करना है  आदिआदि !  हे  अर्जुन ! कर्म  करते  समय  किसी  भी  प्रकार की फल  की कामना न रखते हुए जो कर्म करता है  तथा इन्द्रिय जीत  और  सम्पूर्ण  सुख  के  भौतिक  पदार्थो  की इच्छायुक्त्त   संक्लपों  का   त्याग  करने  वाला  ही सच्चा योगी या सन्यासी है ! जिसका मन वश  में है और प्रसन्नचत्ति  होकर स्वयं  को किसी  अपयोगी अर्थात्    अच्छे    कार्य   में     लगाता    है  ,   वही  योगरूढ़  ( कर्मयोगी  )  की   अवस्था  वाला   है  ! इसलिए ऐसा कर्मयोगी पुरूष हमें बनना है ! मनुष्य को आत्मोन्नति करनी  चाहिए , हमेशा यह ख्याल  रहना   चाहिए  कि  मैं  अपनी  आत्मोन्नति   कैसे करूं  ! आत्मा  की  अधोगति ( Degradation ) न होने दें क्योंकि जीवात्मा स्वयं ही स्वयं  का  मित्र  व शत्रु होता है !

              अर्जुन प्रशन पूछता है कि कब जीवात्मा स्वयं का मित्र वा शत्रु होता है !

                                भगवान ने बहुत अच्छी रीति से उसका जवाब दिया कि जब मन सहित  इन्द्रियाँ जीती हुई हैं तो वही मन मित्र  है ! जब  मन  सहित इन्द्रियाँ परवश हैं , अधीन हैं , कहीं किसी  बुराईयों के अधीन  हैं , कहीं  कोई  ईर्ष्या , द्वेष के अधीन हैं तो वह परवश है , तब मन उसका शत्रु  है !  जिसने मन को जीत लिया हो , ऐसा पुरूष मान , अपमान , सुखदुःख ,  सर्दीगर्मी  में  मन   को  शान्त  रख परमात्मा की स्मृति में समा  जाता  है  ! जो  योगी अपने  आध्यात्मिक  ज्ञान और आत्मअनुभूति से पूर्णताः   सन्तुष्ट  रहता   है  !   ऐसे   जितेन्द्रिय  की  दृष्टि  में  मिट्टी , पत्थर व कंचन एक समान है !  वह भिन्नभिन्न   स्वभाव   वाले  व्यक्त्ति  के प्रति  भी समान भाव  से व्यवहार  करता  है  ! संयम   युक्त्त  अपरिग्रही  योगी  सदा एकांत में रह अपने मन को वश में कर निरन्तर परमात्मा की याद में  बुद्धि को एकाग्र करते हैं !

? फिर  ध्यान में याथार्थ  रूप से बैठने की विधि बतायी  ! शान्त  अन्तःकरण  भयरहित ,  ब्रह्यचार्य व्रत  में  स्थित  योगी  को , पवित्र एकांत  स्थान  में  आसन  बिछाए ,   दृढ़तापूर्वक  सीधा  बैठकर  मन   इन्द्रिय  तथा  कर्म  को   संयम   रखकर   निराकार परमात्मा पर  मन , बुद्धि और दृष्टि को एकाग् कर ह्रदय  के अन्दर  शुभभावनायें भरकर योगाभ्यास करना  चाहिए   !  वह  योग  उचित  आहारविहार   कर्मों   में   उपयुक्त्त   चेष्टा  और   सन्तुलित  शयन जागरण करने वाले का ही पूर्ण होता है ! ये है योग के ध्यान की सही विधि !

No• 053      ?   परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग         पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

           अब प्रशन उठता है कि भगवान ने इस योग की विधि ( no 52 ) क्यों बतायी ! उसके  पीछे भी क्या गुहाृ  रहस्य  है ? क्योंकि  जब ध्यान  में बैठना होता है तो आजकल की दुनिया में हरेक को घुटनों  की  समस्या  है   किसी  को  पीठ  का  प्रॉब्लम  है   इसलिए  यह जरूरी नहीं है कि  आप नीचे  बैठकर आसन लगाओ , क्योंकि कोई तकलीफ को बढ़ाना नहीं है ! ऐसा  ना हो ध्यान लगाना  चाहो परमात्मा में पर और ध्यान बारबार घुटनों में या पीठ में ! तो भगवान का  ध्यान कहाँ  लगेगा ! जिस तरह से भी आप  आराम  से बैठ  सके , लेकिन  भगवान ने  ये बात भी क्यों कही इसके  पीछे भी एक  साइंस है ! ध्यान में बैठने के लिए जो कहा कि एकांत स्थान में आसन  बिछाए ,  दृढ़तापूर्वक  सीधा  बैठें  !  सीधा बैठने  के  लिए  क्यों   कहा   आसन  बिछाकर  के  क्योंकि  मनुष्य  के  शरीर में तीन  द्वार  है जहाँ  से हमारी  एनर्जी निकलती  है ! उसमें  पहला द्वार  है पैर !  यहाँ  से   बहुत  एनर्जी  बाहर  निकलती है  ! इसलिए लोग महात्माओं के  सनिध्य  में जब  जाते हैं तो चरणस्पर्श करते हैं !  इस तरह करते हैं  कि वहाँ  से जो  एनर्जी  निकल रही है वह  हमारे तरफ आये ! लेकिन  वह  आती  नहीं  है , ये  खाली  एक भावना है , कि वहाँ से जो एनर्जी निकल रही है वह हमें प्राप्त होती है !

                    कई लोग गुरू के चरणों को थाली में रखकर  धोते  हैं और उस  पानी  को  चरणामृत के रूप  में बांटते  हैं ! उस  एनर्जी  को पानी  में  लिया और सभी को बांटा अर्थात् उस पानी को पीयेंगे तो हमारी  आत्मा  भी  चार्ज  हो जायेगी  !  ऐसे  कोई आत्मा  चार्ज नहीं  होती है ! ये  एक अंधश्रद्धा  का रूप  ले   चुका  है  !   लेकिन   वास्तव   में  आसन बिछाकर  के  इस आसन  में बैठने का भाव यही है कि  जब  पैरो  को  मोड़  देते  हैं ,  एनर्जी  वहाँ  से निकलना बन्द हो जाती है ! इसलिए पैरों को मोड़ा जाता है !  वो ऊर्जा फिर ऊपर  की ओर  आती  है   मस्तिष्क में जो एकाग्र करने के लिए आवश्यक है   वो  ऊर्जा उसके काम में आती है ! वो  ऊर्जा  बहुत जरूरी  है !  इसलिए  पहले  के  ज़माने  में घरों  में सोफासेट नहीं होता था बैठकें होती थीं ! भोजन के लिए भी कोई  डायनिंग टेबल  नहीं होते  थे और न ही कुर्सी होती थी ! नीचे  बैठकर  भोजन करते थे ! आज भी  कई परिवारों  में नीचे बैठकर  ही भोजन किया जाता है

No• 054     परमात्मअवतरण  एवं  कर्मयोग         पाँचवां     और   छठाा  अध्याय   

                एक बहन ने अपना अनुभव बताया कि उसका बेटा  पंद्रह साल  का है ! लेकिन जब भी में उसको कहती हूँ  कि बेटा मन्दिर चल , तो  उस का पहला  सवाल  यही  होता है कि हिन्दओं  में  इतने भगवान क्यों  हैैं ? क्रिशचन  में एक गॉड  क्यों है ? वो माँ उसको कहती है बेटा ये  सब भगवान हैं ! तो कहता है सब भगवान नहीं हो सकते , भगवान एक होना चाहिए  ! इसलिए  जब माँ  उसको  कहती है बेटा चल मन्दिर तो वो कहता है , मैं मन्दिर जाने से कनफ्यूज़ हो जाता हूँ ! कहाँ अपने  मन को एकाग्र करूं ? मुझे  लगता  है  वहाँ  हमारा  समय नष्ट  हो जाता  है !  मैं  अपना  टाइम  वेस्ट  करने  के  लिए मन्दिर में क्यों जाऊं , वो बच्चा अपनी माँ से कहता है कि इससे अच्छा  तो मैं चर्च में जाऊं , तो कम से कम  वहाँ  एक  गॉड  है , जहाँ  मैं  अपने  मन  को एकाग्र  करूं !  वो  बहन ने बतलाया कि मेरा  बेटा चर्च जाता है मन्दिर में नहीं जाता है !  मुझे ये हर्जा नहीं कि वो चर्च में क्यों जाता है ?  लेकिन  ये दुःख ज़रूर  कि  वो  मन्दिर  क्यों नहीं जाता ? कल  को आपके  बच्चे  ने ये सवाल  आप से पूछ लिया , तो क्या आपके पास उसका कोई उत्तर है कि हिन्दओं में इतने  भगवान  क्यों हैं  ?  क्रिशचन  में एक गॉड क्यों है ?  मुसलमानों  में  एक  अल्लाह  क्यों  है ?  आपके पास  जवाब  है ? इसलिए बच्चे ने कहा कि मैं मन्दिर में जाकर टाइम वेस्ट करता हूँ !  इससे तो अच्छा  मैं  चर्च  में  जाऊं  या  मस्जिद  में जाऊं तो आपको कैसे लगेगा ?

                   भावार्थ ये है कि कहीं हमारे अन्दर ही अज्ञानता  है , जिस अज्ञानता के  कारण हम आज की पीढ़ी को यथार्थ वैज्ञानिक तर्क नहीं दे पाते हैं ! क्योंकि  हमारे श्रषिमुनियों  के पास  इतना सुन्दर साइंस  था , मेडिटेशन  का  भी बहुत सुन्दर साइंस  था  !  जो  कुछ   भी   उन्होंने   किया  उसके  पीछे वैज्ञानिक  कारण था !  लेकिन क्योंकि  उस  वक्त्त आत्माओं में वो पात्रता नहीं  थी !  इसलिए उन्होंने कुछ भी समझाया  नहीं !  लेकिन आज  की पीढ़ी इतनी   समझदार   है  कि    उसको    हर  बात  में लॉजिकल उत्तर चाहिए ! अगर  हमें  पता होगा तो हम  अपने बच्चों  को एक  भगवान  का परिचय दे सकेंगे और गाईड कर  सकेंगे , इसलिए  ज़रूरी  है कि भगवान कौन है , पैरों को क्यों मोड़ना चाहिए , हाथों को  क्यों जोड़ना चाहिए  क्योंकि  इस सर्किट को बन्द करना है ! जब सर्किट बन्द हो जाता है तो फ्लो ऑफ एनर्जी नैचरल रूप से मिलती है ! आगे आँखों से एनर्जी फ्लो कैसे होता है उसके बारे में वर्णन करेंगे !