आत्म-स्वरूप स्थिति 1

 No• 063 
    🌀    आत्म-स्वरूप स्थिति    🌀
      सातवाँ    और   आठवाँ अध्याय   
 लेकिन वास्तव में अगर देखा जाए तो यह ध्यान की प्रथम अवस्था है , कैसे  ?  तो हमें  सागर मंथन  कौन-सा-करना  है ? ये  मन जो  सागर की तरह है ! उसे सागर के साथ भेंट  क्यों  किया जाता है ? क्योंकि सागर में कभी भी आप  सम्पूर्ण  इमेज नहीं देख सकते  हैं  !  नदी  का  पानी  कभी  इतना स्थिर हो जाता है जो  सम्पूर्ण  इमेज उसमें  दिखाई देती है ! तालाब का पानी भी इतना स्थिर हो जाता है जो सम्पूर्ण  प्रतिबिंब  उसमें  दिखाई दे !  लेकिन सागर में वो  स्थिति  कभी नहीं  आती है  जो उसमें सम्पूर्ण  प्रतिबिंब  दिखाई  दे !  नित्य  लहरें  चलती रहती हैं ! कभी  छोटी-छोटी लहरें चलती हैं , कभी बड़ी लहरें  चलती  है ,  कभी  तो  तूफान  खड़ा हो जाता है ! हमारा मन भी  एक सागर  की  तरह  है   क्योंकि कोई भी क्षण ऐसा नहीं जब मन के विचारों की लहरें न चलती हैं ! कभी भी मन  स्थिर नहीं हो सकता है ! नित्य कुछ न कुछ विचार चलते रहते हैं  साधारण से साधारण  विचारों की  लहरें भी चलती रहती हैं और कभी टेंशन हो जाता  है !  बड़ी-बड़ी लहरें  चलने  लगती  हैं  ! कभी   कोई  बात  लेकर परेशान हो जाते हैं तो  तूफान  खड़ा हो  जाता है ! तो मन एक सागर की तरह है ! अब ये सागर मंथन करना है ! अमृत-कलश अन्दर ही है बाहर नहीं है उस अमृत-कलश को निकालना है ! अब ये सागर मंथन जो करते हैं वह देवतायें और असुर कौन हैं ? जिनके  अच्छे विचार  हैं  वो  देवो के समान हैं और जिनके बुरे विचार हैं वो असुरों के समान  हैं !  ऐसा भी नहीं है  कि मेडिटेशन  में बैठे  तो मन  में विचार एकदम  खत्म  हो  जाते  हैं ,  नहीं  !  इतना  जल्दी सहज खत्म नहीं होते , बीच-बीच में विचार उभरतें रहते हैं !
            जितने अच्छे विचार करने का प्रयत्न करते हैं उतने ही बीच-बीच  में बुरे  विचार भी आते रहते हैं ! उन  दोनों के  बीच  में सागर मंथन  हो रहा है ! अब  ये सागर  मंथन  होता है तो सबसे  पहले क्या निकलता है ? विष निकलता है ! इसका अर्थ है कि अन्दर   में   जो   इतने    सालों    से   वा  जन्मों  से निगेटिविटी का विष भरा हुआ है , वह  निकलेगा ! एकदम ध्यान  किसी  का नहीं  लग  जाता !  सबसे पहले  वो  विष   निकलेगा  !  लेकिन  जब  ये  विष विचारों के रूप में निकलता है तब कई  लोग इतना घबरा जाते  हैं कि पता  नहीं  मेरा  मेडिटेशन , मेरा ध्यान तो कभी लगने वाला ही नहीं है ! ऐसा लगता है ! क्योंकि जैसे ही ध्यान में बैठते हैं  इतने निगेटिव विचार आते हैं क्या करें ? ये विष तो निकलेगा ही ! उस में घबराने  की  ज़रूरत  नहीं  है !  लेकिन उस समय शिव परमात्मा को याद करो !  cont……
[04/06, 10:15] kamleshbhai hypno: एक मजदूर नया नया दिल्ली आया।
पत्नी को किराए के मकान मे छोडकर काम की तलाश मे निकला।
एक जगह गुरुद्वारे में सेवा चल रही थी।
कुछ लडकों को काम करते देखा उनसे पूछा-
“क्या मैं यहाँ काम कर सकता हूँ?”
लडको ने ‘हाँ’ कहा।
मजदूर-
“तुम्हारे मालिक कहाँ हैं?”
लडको को शरारत सूझी और बोले-
“मालिक बाहर गया है। तुम बस काम पर लग जाओ।
हम बता देंगे कि आज से लगे हो।”
मजदूर खुश हुआ और काम करने लगा।
रोज सुबह समय से आता शाम को जाता।
पूरी मेहनत लगन से काम करता।
ऐसे हफ्ता निकल गया।
मजदूर ने फिर लडकों से पूछा-
“मालिक कब आयेंगे?”
लडकों ने फिर हफ्ता कह दिया।
फिर से हफ्ता निकल गया।
मजदूर लडकों से बोला-
“भैया आज तो घरपर खाने को कुछ नही।
बचा पत्नी बोली कुछ पैसे लाओगे तभी खाना बनेगा।
मालिक से हमें मिलवा दो।”
लडकों ने बात अगले दिन तक टाल दी।
मगर मजदूर के जाते ही उन्हें अपनी गलती का एहसास होने लगा और उन्होने आखिर फैसला किया कि वो मजदूर को सबकुछ सच सच बता देंगे। ये गुरूदा्रे की सेवा है। यहाँ कोई मालिक नहीं।
ये तो हम अपने गुरु महाराज जी की सेवा कर रहे हैं।
अगले दिन मजदूर आया तो सभी लडकों के चेहरे उतरे थे।
वो बोले-
“अंकल जी, हमें माफ कर दो।
हम अबतक आपसे मजाक कर रहे थे।”
और सारी बात बता दी।
मजदूर हंसा ओर बोला-
“मजाक तो आप अब कर रहे हो।
हमारे मालिक तो सचमुच बहुत अच्छे हैं।
कल दोपहर मे हमारे घर आये थे।
पत्नी को 1 महीने की पगार ओर 15 दिनों का राशन देकर गए।
कौन मालिक मजदूर को घर पर पगार देता है, राशन देता है।
सचमुच हमारे मालिक बहुत अच्छे हैं।”
और फिर अपने काम पर मेहनत से जुट गया।
लडकों की समझ में आ गया जो बिना स्वार्थ के गुरु की सेवा करता है, गुरू हमेशा उसके साथ रहते हैं और उसके दुख तकलीफ दूर करते रहते हैं।
सभी गुरुओं के चरणों में मेरा शत-शत नमन 🙏🏼🙏🏼
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    🌀    आत्म-स्वरूप  स्थिति    🌀
      सातवाँ    और   आठवाँ अध्याय   
               इसलिए भगवान अर्जुन को भी सावधान करते हैं ! मन अपनी  चंचलता  तथा  अस्थिरता के कारण जहाँ  कहीं भी  विचरण करता है , उसे वहाँ से खीचकर  अपने  वश में  करो और  परमात्मा में लगाओ  !  इस   प्रकार   निरन्तर  योगाभ्यास   की ज़रूरत  है !  योगाभ्यास  में  रहकर  आत्म  संयमी योगी  समस्त पापों  से मुक्त्त हो जाता है ! अभ्यास तो करना  ही  पड़ेगा ! अभ्यास  के  बिना  कुछ भी हासिल नहीं होता है !
                   पांडवों के बचपन की बात है ! अर्जुन और भीम बाजू-बाजू में सोये  हुए  थे ! आधी  रात हुई कि भीम  अचानक  उठकर  चला गया ! अर्जुन की आँखें  खुल  गई  उसने देखा  कि बाजू  में भीम सोया  हुआ था  वो है ही  नहीं ! तो उसने सोचा कि भीम कहाँ चला गया  ?  तो वो  वह  उठकर  बाहर निकलता है और देखने जाता है !  तो देखता है कि भीम  आधी रात में रसोई  घर में  बैठकर खाना खा रहा था ! अर्जुन ने  जैसे ही ये दृश्य देखा तो  पूछता है अरे  भीम तू आधी  रात को  खाना  खा रहा है ? भीम ने कहा हाँ , बड़ी भूख लगी थी ! इसलिए रहा नहीं  गया , मैं  खा  रहा  हूँ  ! अर्जुन  ने  कहा  भले खाओ , लेकिन  अंधेरे  में  तुम  कैसे  खा रहे हो  ? भीम मुस्कुराकर अर्जुन को कहता  है – अर्जुन यह मेरा  अभ्यास है !  मुझे  खाने का इतना अभ्यास है कि वो इधर-उधर  कहीं नहीं जायेगा , सीधा मुँह में ही जायेगा ! इससे अर्जुन ने  प्रेरणा ली कि भीम के अंधेरे में खाने पर भी सीधा मुँह में जाता है !  अगर मैं  भी अभ्यास  करूं , अंधेरे  में  तीर  चलाउं  और निशाने पर  लगे ! इसका नाम है अभ्यास  और उस  प्रेरणा को लेकर अर्जुन ने अपना  अभ्यास  आरम्भ  किया  ! तब  इतना  बड़ा धनुर्धर बन गया !
              भावार्थ ये है कि भगवान ने भी यही कहा कि मन की एकाग्रता को बढ़ाने के लिए , विकसित करने   के   लिए   हमें   भी   निरन्तर  अभ्यास  की आवश्यकता  है और जब  आत्म  संयम  को लेकर अभ्यास  करेंगे तो समस्त पापों से मुक्त्त हो जायेंगे एवं   परमात्म  सनिध्य   में  अतीन्द्रिय   सुख  और परमानन्द  का अनुभव प्राप्त होता  है तथा सर्व  के प्रति  आत्म   भाव   को   विकसित   कर  ‘ वसुधैव कुटुंबकम ‘ की  भावना  जागृत होती है ! ये उसकी एक और उपलब्धि है कि ‘ वसुधैव-कुटंबकम ‘ की भावना को जागृत कर सकते हैं !
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