आत्म-स्वरूप स्थिति

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🌀    आत्म-स्वरूप स्थिति    🌀
      सातवाँ    और   आठवाँ अध्याय   
      तब भगवान ने कहा कि निवार्त ( Vacuum ) स्थान  में  रखे दीपक  की  ज्योति चलायमान  नहीं होती  है ,  लौ   सीधी  ऊपर   जाती  है  !  वैसे  ही योगाभ्यास द्वारा , जब चित वश  में हो और  योगी अपने आत्मस्वरूप में स्थित हो तब  वो योगयुक्त्त कहलाता है ! ये बात बार-बार भगवान  अर्जुन के सामने  रखते  हैं  कि  स्वयं  को  आत्म-स्वरूप में स्थित  करो ! क्यों  ये बात बार-बार कही गयी है ? क्योंकि  व्यक्त्ति जिस  स्वरूप  में अपने को स्थित करता  है , या  मानता  है , उसी  की  याद  उसको सहज  स्वाभाविक  रूप  से  आती है ! मान लो वो अगर डॉक्टर है , तो उसको  रटने की आवश्यकता नहीं  होती  कि  मैं  डॉक्टर  हूँ  लेकिन  जैसे ही वो अपना  कार्य  करता  है  वैसे  ही अपने  स्वरूप  में स्थित हो जाता है !
                       इस तरह परमात्मा अर्जुन को यही समझाते हैं कि  तुम अपने आपको आत्म-स्वरूप में  स्थित  करो  !  क्योंकि  जब  तक तुम स्वयं  को देहधारी  रूप  में  देखते  हो , तब  तक  तुम्हें  मोह सताता  रहेगा  !  ये   मेरे   भाई  हैं , ये  मेरे  बड़े  हैं   उसको मैं कैसे मारूंगा ? यानि मारने की बात कोई व्यक्ति को नहीं है ! मारना है तो वो  मोह  को खत्म करने की बात है और उसके लिए विधि बतायी कि स्वयं को आत्म-स्वरूप में स्थित करो ! जब आत्म स्वरूप में स्थित होंगे तो  कौन याद  आयेगा  ?  तो परमात्मा   की   याद   सहज  ,   स्वाभाविक   और निरन्तर  बनी रहेगी !  इसलिए ये बात  उसको  बार बार कही गई ! फिर भगवान ने इस योगाभ्यास  का महत्व  बताया  कि  इस  योगभ्यास  द्वारा  ही योगी भौतिक   एवं   मानसिक  क्रियाओं  से  उपराम  हो जाता है ! योग के समय हमें कोई  मानसिक क्रिया या भौतिक क्रिया करने  की आवश्यकता  नहीं है ! क्योंकि   कई   बार   कई   लोग   योग  का मतलब शारीरिक व्यायाम समझ लेते हैं , या मानसिक व्यायाम समझ लेते हैं !
                     भगवान ये बात यहाँ अच्छी तरह से समझाते  हैं   और  इसलिए  भगवान ने अर्जुन को कहीं पर भी भौतिक क्रियायें या मानसिक क्रियायें करने  की  प्रेरणा नहीं  दी !  लेकिन  योग माना ही सब बातों से मन को ऊपर  उठाना एवं विशुद्ध मन से आत्म- स्वरूप  में स्थित  होकर  परमात्मा  की याद  में अतीन्द्रिय  सुख  और  आत्म  सन्तुष्टि  का अनुभव  करना ! योगी की बहुत बड़ी उपलब्धि हो जाती है ! इस सत्य स्वरूप में स्थित , सर्व प्राप्ति स्वरूप आत्मा किसी भी प्रकार के दुःख से विचलित नहीं हो सकती ! आत्म-स्वरूप यानि सतोगुणी स्वरूप में जो अपने मन को स्थित करता है तो उस समय वो दैहिक भान से भी ऊपर उठ जाता है ! जिस तरह शरीर में यदि कोई पीड़ा है , कोई दुःख है , दर्द है तो उस समय पीड़ा का अनुभव नहीं होता है और उसके मन को वो विचलित नहीं कर सकता है ! इस योग को दृढ़ निश्चय एवं धैर्यता से अभ्यास करने से ही सफलता मिलती है ! वैसे भी कहा जाता है कि ” दृढ़ता  में  सफलता ” और ” निश्चय  में विजय ” है ! तो जो दृढ़ निश्चय  कर  लेता  है , उसकी  किसी  भी कार्य में सफलता हुई ही पड़ी है ! सफलता मिलेगी या नहीं मिलेगी ये संशय भी नहीं  रहता  है !  लेकिन  जैसे सफलता हुई ही पड़ी है , उस सफलता को भी वह विज़ुयालाइज़ ( Visualize ) कर सकता है ! तो इसलिए  योग  की  उपलब्धि  के  विषय में उसको स्पष्ट किया !
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    🌀    आत्म-स्वरूप स्थिति    🌀
      सातवाँ    और   आठवाँ अध्याय   
             फिर बताया कि मन अपनी चंचलता तथा अस्थिरता  के  कारण ,  जहाँ   कहीं   भी  विचरण करता  हो तो  उसे वहाँ से खीचें और अपने वश  में करें ! क्योंकि मन के भटकने का द्वार कौन-सा है ? मन  के  भटकने   का  द्वार  हमेशा  कोई  न  कोई कर्मेन्द्रिय  ही होती है और  जब  कर्मेन्द्रियाँ  चंचल होने  लगती  हैं  तो  मन  भी  भटकने  का  अनुभव कराता है ! मन अनेक दिशाओं में भागना  आरम्भ करता है ! तो इसलिए भगवान ने अर्जुन  को  कहा कि अगर मन कहीं चंचलता  वश भाग भी गया तो उसको  वापस  खींच  सकते  हैं !  उसको  खींच ले और फिर उसको जोड़ने  का प्रयत्न करें !  क्योंकि ये  तो उसकी  आदत  है ! मन  की  आदत  है  कि उसको विचरण करना  अच्छा लगता  है ! बैठे-बैठे भी कई बार कई लोगों का मन  घर में चला जायेगा   किसी अन्य स्थान पर चला  जायेगा !  क्योंकि  मन की नेचर है कि वो एक  स्थान  पर स्थिर होकर बैठ नहीं पाता है ! हाँ , जहाँ उसकी  रूचि  होती है वहाँ स्थिर हो जाता है ! लेकिन जहाँ  उसकी  रूचि नहीं   वहाँ से भागता रहता है और शुरूआती स्टेज में तो बहुत भागेगा ! लेकिन उसमें  डरने की  बात नहीं ! उसको वापस खींच सकते हैं !
             शास्त्रों में ये बात बतायी गाई है कि सागर मंथन  हुआ  था  !  जब  देवताओं  और असुरों  के बीच में सागर मंथन  हुआ तो उस समय  जो सबसे पहले विष  निकलता है , उसकी  बदबू ही ऐसी थी कि देवतायें बेहोश होने  लगे !  उनमें  से  जो  थोड़े बहुत देवातायें बच गए वे चिंतित  होने लगे कि इस तरह से  देवतायें बेहोश  होते  रहे  फिर  तो  सागर मंथन में  जो  अमृत-कलश  निकलेगा ,  वो  असुर लोग  ले   जायेंगे  !  तो   फिर  देवतायें  भागे-भागे शिवजी के  पास  गये और उनसे विनती करने लगे कि  ये  सागर  मंथन  में  जो  विष  निकल  रहा  है   उसका अब क्या  किया जाए ?  देवतायें  तो बेहोश होने लगे हैं ! उस  समय कहा जाता है  कि शिवजी आते  हैं और आकर  सारा विष पी लेते  हैं !  सारा विष ग्रहण करने के बाद पुनः  सागर मंथन आरम्भ होता है ! धीरे-धीरे एक-एक चीज़ निकलती जाती है ! जो देवतायें बेहोश हो गये थे  उन्हें  भी सुरजीत कर दिया गया  और  फिर  अन्त  में  अमृत-कलश  निकलता  है  !  जो  अमृत-कलश  मोहनी  स्वरूप लेकर विष्णु ने धारण किया और फिर देवातायें को पिलाया गया जिससे  वे अमर हो गए ! ये कथा हम सभी ने शास्त्रों मे सुनी है !
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