परमात्म-अवतरण एवं कर्मयोग

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    💫   परमात्म-अवतरण  एवं  कर्मयोग   💫
                तीसरा द्वार है आँखें ! आँखें तीसरा द्वार क्यों है ? क्योंकि मनुष्य की वृत्ति में क्या चल रह है  वह वायब्रेशन आँखें में दिखती हैं !  किसी  व्यक्त्ति से , कोई आपको अनुभव न भी हो , लेकिन उसकी आँखें  को  देखकर  कहेंगे  ये  व्यक्त्ति  बड़ा  गुस्से वाला या प्यार वाला है ! भगवान ने अर्जुन को कहा कि मन इन्द्रियां  तथा कर्मों को संयम में रखकर के अर्थात्  इन्द्रियों  को जितना  एकाग्र  रखेंगे , उतना मन , बुद्धि  और दृष्टि  तीनों से ह्रदय में शुभ भावना जागृत   होगी  !  अकसर  लोग  मन्दिर  में  जाकर  मूर्तियों के आगे आँखें  बन्द कर लेते हैं , तो किसने किसके दर्शन किये , फिर तो यह कहना चाहिए ना कि दर्शन  कराने  जा रहे  हैं ! हमने तो दर्शन किया ही  नहीं ! दर्शन  करना  माना  दर्शाना , जीवना  में उसको  उतारना ! जो  सामने  मूर्ति है उसके अन्दर कितनी  निर्मलता है , कितनी  पवित्रता है , कितनी सौभ्यता है ! उसको दर्शन करके , अपने  जीवन में अनुभव जरूर करना कि वो निर्मलता , वो पवित्रता   वो सौभ्यता को  अपने जीवन में ले आयें ! इसलिए दर्शन  करो  !  आँखें   बन्द  नहीं   करो ,  नहीं   तो आपको  एनर्जी  नहीं  मिलेगी वहाँ तो पवित्र ऊर्जा मिलेगी ! इसलिए  मेडिटेशन  में  बैठने  की  यथार्थ विधि है कि आँखों को खुला रखना !
                    लेकिन तब कई बार लोग क्या कहते हैं ? आँखें  खुला रखते  हैं बहुत  कुछ दिखाई देता है ! मन  भटक जाता है ! सोचने की बात कि आज एक  कन्या है या एक कुमार  है !  जब तक उनको पता नहीं कि उनका भविष्य का जीवन साथी कौन है ? तब  तक मन भटकता  है ! कौन  होगा ?  क्या होगा ?   कैसा  होगा ?  अनेक  विचार  आते  हैं  ! लेकिन जिस दिन परिचय मिलता है , सम्बन्ध जुड़ जाता है , उसके  बाद  उसको  हमें  सिखाना  नहीं पड़ता है  कि , तुम  भविष्य साथी  को प्रेम से याद करो ! एकांत के पलों में बैठे होंगे और खो जायेंगे ! इतना  खो  जायेंगे  कि पास  से  कोई  गुज़र  जाये   उसको पूछो यहाँ से  कोई  गया तो  क्या  कहते  हैं   पता नहीं ! अरे आँखें खुली हैं , यहाँ  बैठे हैं , इतना बड़ा  व्यक्त्ति  चला  गया और  तुम्हें दिखाई  नहीं  दिया ! तो कहते हैं पता नहीं हमारा ध्यान नहीं था ! वहाँ खुली आँख  से ध्यान  एकाग्र  हो गया , इंसान की याद में और  यदि भगवान को  याद करने बैठो तो ध्यान इधर-इधर चला जाता है ! खुली आँख से तो ध्यान ही नहीं कर सकते ! परन्तु इंसान को याद करना है तो खुली आँख से कर सकते हैं !
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  मेडिटेशन करते समय हमें भगवान से कुछ  माँगना   नहीं  है  !  अग्नि  के पास  हम  खड़े होकर  यह नहीं  कहते  हैं कि तुम हमें गर्मी दो वह तो हमें स्वतः मिलती है ! इसी तरह नदी के किनारे जाकर  हम  यह  नहीं   कहेंगे  कि   नदी  तुम  हमें ठण्डक  दो ! वह हमें स्वतः मिलती है ! आप सिर्फ खड़े  रहो तो  आपके  रोम-रोम  में  शीतलता  का प्रवाह  भर जायेगा ! ठीक  इस  तरह ईश्वर से  कुछ माँगने की ज़रूरत नहीं है ! जब मन और बुद्धि को उस परमात्मा में एकाग्र करते हैं , अंतर्चक्षु  को भी जब एकाग्र करते हैं तब मन में शुद्ध संक्लप करना है ! उसके लिए कुछ संक्लप आपको देते हैं ! आप सिर्फ  विचार  करो  नहीं  बल्कि उसके साथ-साथ अपनी   भावनाओं    को   भी   जोड़ते    जाओ  ! परमात्मा  के   प्रति  शुभ   भावनाओं  को  जोड़ते  जाओ ! आप सिर्फ विचार करो नहीं बल्कि  उसके साथ-साथ अपनी भावनाओं को भी जोड़ते जाओ   परमात्मा   के  प्रति  शुभ   भावनाओं  को  जोड़ते जाओ ! जितना  उसको  जोड़ते  जायेंगे उतना उस ऊर्जा  को आप स्वयं  में प्रवाहित  होते हुए अनुभव करेंगे ! क्योंकि  कहा  जाता  है  कि  जैसा  सोचोगे वैसा बन बनोगे ! ये एक सिद्धांत है ! ये एक अनादि सिद्धांत  है ! जैसे- जैसे आप को अगले अध्याय में विचार  मिलते जायें , वैसे-वैसे आप मन में विचारों को  ले आयें  !  जितनी  शारीरिक  एकाग्रता  होगी उतनी मन की एकाग्रता  को ले आना सहज होगा ! अगले  अध्याय में  मेडिटेशन  कैसे  करनी  चाहिए उसकी विधि के बारे में प्रकाश ड़ालेंगे !
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 जब मेडिटेशन करो तो कुछ क्षण के लिए हम अपने  मन के विचारों  को बाह्य  सभी बातों से समेट कर अभ्यास करो , तो मन  की एकाग्रता बढ़ जायेगी और सुख और शान्ति की अनुभूति होगी !
           स्वयं.. को ..आत्मा..निश्चय.. करते हैं ! अंतर्चक्षु से…स्वयं को देखो..भृक्रुटी के मध्य में… मैं…अविनाशी.. ज्योतिपुंज  हूँ.. दिव्य शक्त्ति हूँ.. अजर-अमर…सदा शाश्वत् ..में आत्मा.. इस शरीर रूपी मन्दिर में.. चैतन्य शक्त्ति हूँ.. आँखों द्वारा.. देखने वाली…मुख द्वारा बोलने वाली…कानों द्वारा… सुनने वाली…मैं …अति सूक्ष्म…दिव्य.. प्रकाश पुंज हूँ… धीरे…धीरे…अपने मन बुद्धि को..ले चलते हैं… एक यात्रा पर…अनंत की ओर.. पंच तत्व की दुनिया से दूर..सूर्य , चंद्र , तारागण से भी पार…परमधाम.. जो मुझ आत्मा का..असली घर है… अंतर्चक्षु से…मैं स्वयं को..उस दिव्य लोक में देख रहा हूँ…. जहाँ चारो ओर… दिव्य प्रकाश फैला हुआ है… जहाँ कोई बन्धन नहीं… कोई बोझ नहीं… मैं आत्मा.. स्वतंत्र हूँ… सम्पूर्णमुक्त्त अवस्था में… कितनी सुन्दर महसूसता है ये …मुक्त्त अवस्था.. इस दिव्य लोक में …मैं आत्मा.. अपने सतोगुणी स्वरूप में. स्थित… मेरा असली स्वरूप.. शुद्ध और पवित्र है… अपने चारो ओर.. दिव्य प्रकाश का …आभामण्डल देख रही हूँ.. उस प्रभामण्डल में.. मैं आत्मा… प्रकाश पुंज हूँ.. मैं आत्मा.. अपने स्वधर्म में स्थित हूँ.. मेरा स्वधर्म.. शान्ति.. मेरे मन की गति..शान्त होती जा रही है… चारो ओर ..परम सुख समाया हुआ है.. जो सुख…अतीन्द्रिय सुख है.. इसी..शान्ति में..प्रसन्नता समायी हुई है.. मैं आत्मा.. शक्त्तिस्वरूप हूँ.. धीरे-धीरे..मैं अपने मन और बुद्धि को..पिता परमात्मा के सनिध्य में ले चलती हूँ ..जैसे में आत्मा..दिव्य प्रकाश पुंज हूँ.. वैसे मेरे पिता परमात्मा भी.. प्रकाश पुंज हैं.. दिव्य तेजोमय हैं..चारो ओर.. दिव्य प्रकाश का प्रभामण्डल है… कितना सुन्दर स्वरूप है.. अनंत है.. सर्वशक्त्तिमान है.. परमात्मा के सानिध्य में.. कुछ क्षण.. निवास करने का सौभाग्य.. कितना अमूल्य है… परमात्मा की..अनंत किरणें..चारो ओर… प्रवाहित हो रही हैं… और मैं स्वयं में.. सर्व शक्त्तियों की किरणों को..समाती जाती हूँ.. परमात्मा का..असीम प्यार.. मैं स्वयं में महसूस कर रही हूँ.. कितनी सौभाग्यशाली आत्मा हूँ.. जो परमात्म स्नेह की..पात्र आत्मा बन गयी..कितना सुन्दर अनुभव है ये…कुछ क्षण के लिए.. अपने मन और बुद्धि को..उस दिव्य स्वरूप पर..एकाग्र करती हूँ.. और परमात्मा से..सर्वशक्त्तियों में.. समा जाती हूँ… जैसे अनंत किरणों की बाहों में… समाती जा रही हूँ.. सर्व शक्त्तियों के प्रवाह को…मैं स्वयं में …अनुभव कर रही हूँ… और मैं आत्मा.. सशक्त्त बनती जा रही हूँ… धीरे-धीरे..अपने मन और बुद्धि को..इस पंच तत्व की दुनिया की ओर.. भृक्रुटी के मध्य में.. स्थित करती हूँ.. और शरीर की सर्व कर्मेन्द्रियों द्वारा.. अपने हर कर्म में… व्यवहार में.. सम्बन्ध में.. इन गुणों की शक्त्तियों को…प्रवाहित करना है…. ओम् शान्ति.. शान्ति.. शान्ति…. शान्ति….!
🍀 इस विधि को आप लिख कर याद कर सकते है या सी•डी भी किसी नजदीकी ब्राह्यकुमारीस सेन्टर से ले सकते है या वहाँ जाकर सीख भी सकते है ! इससे आपके जीवन में बहुत लाभ मिलेंगा और आप को तनावमुक्त्त बनने में मदद मिलेगी !