आत्म-स्वरूप  स्थिति -4

                                    No• 079 

      सातवाँ    और   आठवाँ अध्याय   

                 थोड़ा सा अगर अपने जीवन में भीतर झांककर  देखें  कि हमारे  जीवन में जब भी  कष्ट आया , दुःख , दर्द आया, कई समस्यायें ऐसी आई जहाँ इतनी  परेशानी  बढ़ गयी !  दुनिया  के लोग आकर सहानुभूति के दो शब्द कहकर चले जायेंगे  लेकिन जो अदृश्य शक्त्ति मिलती है , वो  कहाँ से मिलती है ? भगवान हर वक्त्त देखते हैं ! हम भले उसको प्यार करें या ना करें लेकिन वो इतना प्यार करते है कि हमें उसका अहसास  ही नहीं है ! कई बार लौकिक  में  भी  कहते  हैं कोई  बच्चा  अपने मातपिता  को कह  दे कि भई आपने हमारे लिए किया तो उसमें कौनसी  बड़ी बात थी ?  ये  तो आप  का  फर्ज़  था ! उस  समय  आप को  कैसा लगेगा ! वैसे भगवान के इतना प्यार करने के बाद भी उस  प्यार  को  महसूस करने की शक्त्ति नहीं होती है !  अगर मनुष्य  भी  ये  कह  दे  कि  अगर भगवान ने मदद की तो उसमें  कौनसी बड़ी बात थी ? ये तो उसका फर्ज़  था ! कैसा  लगेगा !  कई बार आपने जीवन में अनुभव किया होगा कि रात को  सोते  वक्त्त सुबह में  अगर  कोई  कारणवश  जल्दी  उठना  होता  है ! कोई प्लेन पकड़ना होता है , कोई ट्रेन पकड़नी होती है तो अलार्म लगाकर सोयेंगे ! लेकिन अलार्म बजने से पांच मिनट पहले ही आँख खुल जाती है , अनुभव किया है ना पांच मिनट पहले खुल जाती है और ऐसा महसूस होता है जैसे किसी ने खटिया हिलाकर  उठाया हो !  ये किसने उठाया ?

                    भगवान अपने बच्चों से इतना प्यार करते हैं ! फिर भी हम चाहे उनको  पूछें  न  पूछें , उनको प्यार से याद करें न करें , भगवान का प्यार इतना अधिक है बच्चों के प्रति कि उसको  मालूम है आज बच्चे  को  प्लेन  पकड़ना है , ट्रेन पकड़नी है ! तो उसको खटिया हिलाकर  उठाता भी है ! ये अनुभव किया  होगा  आप सभी ने ! सुबह  उठाने से  लेकर रात्रि  सोने  तक  वो हमारा ध्यान रखता है ! सुबह उठाने के बाद उसके मन में यही होता है कि मेरा बच्चा सबसे पहले  उठकर मुझे  तो  याद करेगा ! लेकिन हम क्या करते हैं ?  उठने के बाद सबसे पहले पूछेंगे कि आज का न्यूज़पेपर  आया कि नहीं  आया ?  न्यूज़पेपर  लेकर  बैठ  जाते  हैं  भगवान को याद नहीं  करते ! भगवान  सोचते  हैं चलो कोई बात नहीं दुनिया की खबर भी पढ़ लेने दो ! दुनिया की खबर पढ़ लेने के बाद ज़रूर मुझे याद करेगा ही करेगा ! लेकिन न्यूज़पेपर पढ़ने के बाद हम क्या करते हैं ? स्नान आदि करके , फ्रेश होकर नाश्ता करने बैठ जाते हैं !

भगवान  हमें कितना  प्यार करते हैं , इसके लिए खुदा का खत अवश्य ही पढ़िये ….?

  खुदा का खत 

                                   मीठे बच्चे !

                  ¢ᄂニज सेवेरे निंद्रा में से  आप  उठे तब  एक आशा लिए में  आपको देख  रहा था कि आप जरूर  कुछ  बातें  मुझ से  करेगें, चाहे  केवल  थोडे  ही  शब्द  क्यों  न  हो ? आप मेरा  अभिप्राय अवश्य जानना  चाहेंगे अथवा  कल आपके जीवन में  घटी  शुभ घटना के  लिये मुझे धन्यावाद  देंगे ! किन्तु मुझे  ऐसा लगा कि आप अत्यन्त व्यस्त थे ! कार्यस्थल.  पर   पहुँचने  की   जल्दी   में,   अपने प्रात:कार्यो से निपटने में रत थे !

                   ¢ᄂヤर में प्रतिक्षा करता रहाजब  आप  तैयार  होकर  घर   से   निकल  पड़े  तब  में समझता था  की  कुछ  मिनट ठहरकर हेलो‘  तो जरूर कर पायेंगे, किन्तु आप बुहत व्यस्त थे ! एक बार तो आप को पन्द्रह मिनट इंतजार करना  पड़ा और  कुर्सी  पर बैठने के अलावा और  कोई  काम नहीं था ! फिर, मैने देखा कि आप एकदम  से खड़े हो गये ! मैने सोचा था  कि आप मुझसे बात करना चाहते है, परन्तु  आपने तो फौरन फोन जोड़ा और मित्र से गपशप करने लगे !

               ¢ᄂニपको कार्य  पर रवाना  होते  हुए  मैंने    देखा   था    और    फिर    दिन–  भर.   मैने  धैर्यतापूर्वक   इंतजार   किया    था   आपकी   इन प्रवृत्तियों   को  देखकर मैने  अनुमान   किया   कि  आप इतने व्यस्त थे जो मुझसे  कुछ भी कहने  कि फुर्सत  नहीं   थी  !  जब  भोजन  के   पूर्व  आपने आसपास नजर   दौड़ाई   तो  मुझे  लगा  था   कि  शायद मुझे  से बात करने के लिय आप बेताब है ! आपने  तीनचार  टेबुल तक अपनी निगाहें घुमाई  तो  आपको   कई  मित्र  खाना शुरू करने से पहले मुझसे थोड़ी सी  बातचीत  करते  हुए दिखाई दिये, पर आपने वह  नहीं किया ! कोई बात नहीं !

                   इसी  प्रकार   कुछ   समय  और  निकल  गया  और आपके घर लौटने  के  पशचात् मैने आशा रखी  की  अब  तो आप अवश्य  मुझसे बातें करेगें यधपि ऐसा जान पड़ता था  कि आपके बुहत कुछ कार्य करने  बाकी  है ! उनमें  से कुछेक कार्य  पूर्ण  हो  जाने  के  बाद आपने  टी•वी  चालु किया ! में  यह समझ नहीं  पा रहा हुँ  कि आपको टी•वी पसन्द है या नहीं,  बस  जो  उस पर  दर्शाया जाता है  उसे देखने में आप प्रतिदिन  बुहत समय व्यय करते हैं ! कार्यक्रमो में तल्लीन आप और सब कुछ भूल जाते है ! में सब्रतापूर्वक फिर से इंतजारी से भरी निगाहों से आपको टी•वी देखते हुए, रात्रिभोजन  लेते   हुए  निहारता  रहा  लेकिन  फिर  से आपने मुझसे कोई बातचीत नहीं की !

                  ¢ᄂᄄिंद्रा के समय मुझे  ख्याल आया  कि आप  बहुत  थके  हुए  है  ! अपने  परिवारजनों  को  शुभरात्री कहते  हुए आप बिस्तर पर लेट  गये  और  कुछ  क्षणों   में  निंद्राधिन   हो   गये  !  चलो,  कोई  बात  नहीं,  शायद   आपको   यह  अहसास   ही  नहीं   होगा  कि   मैं  सदा  आपके  आसपास  ही  रहता  हूँ   !  मेरे   पास  आपसे   बुहत  अधिक   धैर्यता   है  और   मैं   आपको  भी   यही  सिखाना  चाहता  हुँ  कि  अन्यो   के  साथ  भी  किस  प्रकार  धैयर्तापूर्वक  रहना  चहिए  !

               मैं   आपको  इतना  अधिक  प्यार  करता   हुँ  कि  मैं  हर    रोज़   आपकी   अराधना, आपके दिल का प्यार, ह्रदय  के उदगारों को सुनने   की    प्रतिक्षा   करता   रहता    हूँ    ! एक   तरफा  वार्तालाप   करना  किठन कार्य   है  ! अच्छा, फिर  से  आप  सोकर  ऊठ  रहे  और  मैं, फिर एक बार  प्रतिक्षा  कर  रहा  हुँ…..दिल   में  आप   के  प्रति  अनहद प्यार  लेकर ,   इसी   आशा  मे  कि  आप आज तो मेरे लिय ज़रूर कुछ समय निकालेंगे

    अच्छा, शुभदिन मुबारक हो

                         आपका मित्रखुदा दोस्त !

                                     No• 080 

       आत्मस्वरूप  स्थिति    

            आज आप मान लो कि आप अपने बेटे से इतना प्यार करो ! सुबह  उठाने से लेकर रात्रि तक और आप उसका इंतजार  करते रहो कि मेरा बेटा एक बार तो मेरी तरफ देखे और वो आपकी तरफ देखता तक न हो ! आपको  कैसे लगेगा ! इसलिए भगवान हमारे मातपिता हैं , वो इतना प्यार करते हैं , तो  कम  से  कम  हम  भी  तो उनके  प्यार का रिसपांड  तो  करें  ?  फिर  भी  वो कितना दयालू , कृपालू है कि जब भी हमारे सामने कोई परिस्थिति आती है तो फिर भी अदृश्य रूप में शक्त्ति देते है ! इतना दायलु , कृपालु कहाँ मिलेगा ? यह  अनुभव अगर  करके  देखो तो  पता चलता है कि सचमुच भगवान  का  प्यार कितना  है ! और हम एक बार भी सुबह से रात  तक , उनकी  तरफ देखते  नहीं ! और   उसके   बाद   भी  भगवान   के   सामने   ही शिकायत  करते हैं  कि हे प्रभु ! मेरा मन तो लगता ही नहीं है ! कैसा  वो  बच्चा  होगा  जो  अपने  माँ बाप को कहे कि भई मेरा मन तो आपमें लगता ही नहीं है ! इसलिए  मैं क्या  करूं ! माँबाप को कैसे लगेगा अगर बच्चा ऐसा कहेगा ?

             जब ध्यान में बैठना है , तो ध्यान उसी का ही  लगता  है जिसके  ह्रदय  में अनन्य भाव हो , ईश्वर  के  प्रति  !  देखो  कैसे  भगवान  भी  उसको रिसपांड  करते  हैं !  आगे  भगवान समझाते हैं कि सतयुग  , त्रेतायुग  ,  द्वापरयुग  और  कलियुग  इन चारों   युगों   का   एक  कल्प  होता  है  !  सतयुग , त्रेतायुग ये ब्रह्या का दिन माना जाता है तथा द्वापर और कलियुग से ब्रह्या की रात्रि मानी जाती है !

             ब्रह्या के दिन अर्थात् सतयुग , त्रेतायुग के आरम्भ में आत्मायें अव्यक्त्त से व्यक्त्त प्रकृति का आधार लेती हैं ! इस संसार में आती हैं ! और  जब ब्रह्या  की  रात्रि  का अन्त  होता  है अर्थात् द्वापर , कलियुग का  अन्त  होता  है ,  तो  सभी  आत्मायें व्यक्त्त ( साकार  शरीर  से )  से  अव्यक्त्त  ( बिना शरीर से आत्मा ) अवस्था में  चले  जाते  हैं !  फिर घर  अर्थात्  आत्माओं  की दुनिया में जाना पड़ता है ! ये  दुनिया  अर्थात् सृष्टि  का  क्रम है  और  इस तरह से ये संसार का  चक्र चलता है ! परन्तु  इसके अतिरिक्त्त  एक  अव्यक्त्त , शाश्वत  प्रकृति है  जो सभी पंच महाभूतों  के नाश  होने पर भी नाश नहीं होती है ! वो दिव्य लोक नाश नहीं होता जो व्यक्त्त और अव्यक्त्त अवस्था से श्रेष्ठ है ! अविनाशी और सबसे परे है ! भगवान कहते हैं वही मेरा परमधाम है ! जहाँ पर मैं विराजमान  होता  हूँ ! यानि  अभी तक भी अर्जुन श्रीकृष्ण के रूप में ही भगवान  को देख रहा था ! तब भगवान पुनः स्पष्ट करते हैं कि हे अर्जुन  ! मैं  उसी   अविनाशी   सबसे   परे  ते   परे लोक में , जिसको परमधाम  कहा जाता है वहाँ मैं विराजमान होता हूँ ! भगवान  स्पष्ट बता रहे हैं  कि मैं  इस  संसार  में नहीं  होता  हूँ ! मैं वहाँ रहता हूँ ! कहते भी है न कि उच्चे से उच्चा तेरा धाम , उच्चा तेरा काम और उच्चा तेरा नाम ” ! लेकिन अधर्म के नाश  के समय ( वर्तमान  समय ) पर  मैं  ऐसे  युगे युगे अवतरित होता हूँ , उस अव्यक्त्त  धाम अर्थात् परमधाम जो इस चाँदसितारों  से ऊपर है से इस व्यक्त्त धाम में सकारी दुनिया में !

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