समर्पण…..भाव 2

                                    No• 083 

      नवाँ ,  दसवाँ ,  गयारहवाँ  एंव  बारहवाँ  अध्याय

             अब तक भगवान ने विभिन्न तरीकों से  अर्जुन  को  समझाना   चाहा  कि  किस  प्रकार अपने मन को वो नियंत्रित कर सकता है ! फिर भी अगर उसको कठिन लगे तो कैसे समर्पण भाव को अपनाना  ज़रूरी  है ! परमात्मा हम  सभी के सर्व मानसिक   बोझ  को  उठाने  के  लिए  तैयार  है  ! भगवान  यही  चाहते  हैं  कि  मनुष्य अपना कर्तव्य करते हुए  भी , सर्व  प्रकार के  मानसिक  बोझ को उस परमात्मा को सौंप दे ! बुद्धि को समर्पण करते हुए अपना नित्य कर्म करता चला जाये  !  समर्पण भाव  भी  तभी  आएगा  जब  ईश्वर का  वास्तविक स्वरूप हमारे सामने स्पष्ट हो ! इसलिए जैसे अर्जुन भी साधारण  स्वरूप  में ईश्वर  को देख रहा था तो भगवान को बारबार अपने वास्तविक स्वरूप की तरफ   ईशारा  करना   पड़ा   कि   मेरा  वास्तविक स्वरूप  सूक्ष्म  ते  सूक्ष्म , अणु  से  भी  सूक्ष्म दिव्य ज्योतिर्मय  प्रकाश स्वरूप  है !  परमात्मा  का  जो वास्तविक धाम है वो परमधाम है !

             सर्वप्रथम भगवान यही बात स्पष्ट करते हैं कि हे अर्जुन ! इस  परम  गोपनीय  ज्ञान को भी मैं ज्ञान    सहित    कहूंगा  !  अर्थात्   ये   ज्ञान   कोई अंधविशवास का ज्ञान नहीं है , लेकिन ये ज्ञान एक विज्ञान है ! जहाँ हर बात के पीछे कोई न कोई रूप से  तर्क  स्पष्ट   किया  गया  है  !  यह   ज्ञान   सभी विद्याओं  का  राजा है !  इसलिए  इसको  राजयोग कहा जाता है ! संसार में ज्ञान की अनेक शाखायें हैं , लेकिन उन सभी विद्याओं  का राजा राजयोग को कहा गया है !  यह  गोपनीय  रहस्यों से भी अधिक गोपनीय है ! ये परम पवित्र  ज्ञान है ! क्योंकि ये स्व की प्रत्यक्ष अनुभूति का  बोध कराता है !  यह धर्म का भी आदर्श है ! यह स्थायी तथा प्रसन्नता पूर्वक धारण किया जाने वाला है ! ज्ञान यह प्रैक्टिकल से प्रैक्टिकल  है  !  जिसके  लिए  कोई  ये   नहीं  कह सकता  है   कि   ये  ज्ञान  धारण  करना  मेरे  लिए मुशिकल  है  !  मुशिकल  नहीं  है  लेकिन  जो इस रहस्य को समझता है तो उसके लिए  धारण करना आसान हो जाता है !

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