समर्पण…..भाव

 

No• 085   समर्पण…..भाव 

  नवाँ ,  दसवाँ ,  गयारहवाँ  एंव  बारहवाँ  अध्याय

    ?¢ᄂレक्र माना जिसका आदि और अन्त न हो ! जो  नित्य  चलता  रहता  है !  दुनिया  में भी जितने चक्र  बने  हुए  हैं  वो चक्र भी नित्य चलते रहते हैं ! दिन  और  रात  का  चक्र , नित्य  चलता रहता है ! रितुऔं  का  चक्र ,  नित्य  चलता  रहता है ! मनुष्य पुनर्जन्म   का   चक्र  ,   नित्य   चलता  रहता  है  ! प्राकृतिक  साइकल  को  भी  अगर  देखा जाए तो पानी  वाष्पित  होकर  बादल  बनते  हैं , वो बादल जाकर के बरसते हैं , वो पानी फिर नदियों के द्वारा समुन्द्र  में मिल जाता है , ये  चक्र  भी नित्य चलता रहता है ! कोई भी चक्र की आदि और अन्त नहीं है  दिन और  रात के चक्र में कौनसी घड़ी  को आदि कहेंगे , क्या  रात  को  बारह बजे यह चक्र आरम्भ हुआ , सुबह  चार  बजे  हुआ , छः  बजे हुआ , दस बजे  हुआ ,  कब  हुआ  ?  ये  चक्र  है ! चक्र  माना जिसकी आदि और अन्त नहीं है ! जो नित्य चलता रहता है ! हाँ , मनुष्य ने अपनी  व्यवस्था को बनाये रखने के लिए  रात  को  बारह बजे  के बाद  दूसरा दिन कह दिया , लेकिन ज़रूरी थोड़े ही है कि  रात को बारह बजे ही ये चक्र शुरू हुआ था !

              इसी तरह रितुओं का चक्र कब शुरू हुआ पता नहीं है ! हाँ , मनुष्य  ने  अपनी  व्यवस्था को बनाने के लिए पहली जनवरी , नया साल  कह दिया  !  किन्तु  ये  ज़रूरी  थोड़े  ही  है  कि  पहली जनवरी  को  ही  ये  चक्र  आरम्भ  हुआ !  इसलिए कौनसी घड़ी को पहली  घड़ी  कहेंगे  ये नहीं कह सकते क्योंकि ये चक्र है ! ऐसे ही ये सृष्टि  का  चक्र भी नित्य चलता रहता है , नित्य  घूमता  रहता  है ! लेकिन हर चक्र को चार अवस्था से  जरूर गुज़रना पड़ता  है !  दिन  और  रात  के  चक्र  की  भी  चार अवस्थाएं  हैं  !  सुबह ,  दोपहर ,  शाम  और रात्रि , रात्रि  के  बाद  पुनः  सुबह  होती है ! रितुओं में भी चार  अवस्था  हैं–  ग्रीष्म ,  शीतकाल  ,  वर्षा  और वसंत रितु ! फिर  ग्रीष्म  आ  जाता ! इसी तरह इस काल  चक्र  की  भी  चार  अवस्थाएं  हैं–  सतयुग , त्रेतायुग  ,  द्वापरयुग  और  कलियुग !  कलियुग के बाद पुनः सतयुग आता है ! ये चक्र है , इसलिए यह नित्य चलना ही है और नित्य परिवर्तन , ये इस चक्र की प्रक्रिया  है !  परिवर्तन  कुदरत  का  नियम है ! परिवर्तन  होता  आया  है  और  होता  ही  रहेगा  !

 

No• 086  समर्पण…..भाव  

  नवाँ ,  दसवाँ ,  गयारहवाँ  एंव  बारहवाँ  अध्याय

                   आगे भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! कल्प के अन्त में , कलियुग का जब अन्त हो जाता है , तब मेरी प्रकृति अर्थात्  मेरे समान स्वभाव को प्राप्त होते हैं ! अर्थात् आत्मा पुनः अपने तमोगुणी से  सतोगुणी  स्वरूप  में  आ  जाती  है !  कल्प के आदि में मैं उनको बारबार  विशेष  रूप  से सृजन करता हूँ ! आत्मा तो सदा  शाश्वत ( Immortal ) अर्थात् अमर है ! आत्मा न  मरती है  न जन्म लेती है मरता तो केवल पाँच तत्व का बना शरीर  ही  है तो  फिर   यह  सृजन  कैसे  होता  है ?  तो  आत्मा शाश्वत  है ! सृजन  अर्थात्  जो  अकृति  या  शरीर बिना अचेत है ! आत्मा  परमधाम  में  अपने  निज स्वरूप में , प्रकाश  पुंज  में  है , उन्हें  जागृत करता हूँ ! जागृत करके पुनः  इस  संसार  में , प्रकृति  का आधार लेने के लिए प्रेरित करता  हूँ !  तो इस अर्थ में उसके ( आत्मा )  पार्ट को जागृत करना ,  ये  है कि  भगवान  आकर  उसको  बारबार  जगाता  है अर्थात् सृजन करता है !

           फिर भगवान बताते हैं कि मैं कल्प के लिए प्रेरित  करता  हूँ  !   कल्प  के   लिए  प्रेरित  करना अर्थात् सतयुग , त्रेतायुग , द्वापरयुग  और कलियुग में पुनः पार्ट बजाने के लिए प्रेरित  करता हूँ ! कल्प का  भाव  हैउत्थान  की  ओर  परिवर्तन  अर्थात्  आत्मा  दैवी  संस्कारों में  प्रवेश  पाती है ! यही  से कल्प का आरम्भ होता है ! वैसे ही ये चक्र है ! चक्र कब शुरू होगा , कब पूरा  होगा ये नहीं कह सकते हैं , जैसे दिन और रात का चक्र होता  है ! वैसे  इस चक्र की भी आदि अन्त का पता नहीं है ! दिनरात के चक्र का पहला  प्रहर सुबह  को माना जाता है ! सुबह के समय में जब मनुष्यात्मा भी जागृत होकर के दिन भर के कर्म  के लिए अपने  आप को प्रेरित करती है और रात  को  सारा  कर्म समेटकर के वो सो जाती है !

             ? ठीक इस प्रकार , आत्मायें भी कल्प के अन्त में अर्थात् , कलियुग जब पूरा होता है , तो उस  समय परमधाम  जाती हैं ! आत्मा , परमधाम जैसे  स्वरूप  अर्थात्  प्रकृति  को  प्राप्त करती है ! अर्थात् उस  स्वरूप  में  जाकर  कुछ  क्षण के लिए परमधाम  में  विश्राम  करती  है !  फिर  कल्प  की सुबह होती है ! अर्थात् सतयुग का प्रारंभ होता है ! उस समय पुनः वह दैवी संस्कारों में प्रवेश पाती है ! प्रवेश पाकर के जैसे नये सिरे से अपना पार्ट बजाने के लिए तैयार हो जाती है !

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