सम्मोहन 

जब भी हमारा  मन, हमरी आँखे किसी सुंदर  चित्र या वस्तु को देखता  है तो  स्वतः  एकाग्र  होता चला  जाता  है ।  हम उधर  ही खींचते चले जाते है ।

इसके साथ ही कोई हमें निरन्तर  सुझाव देता  चला जाये तो हम उसके प्रभाव में आ कर उसका कहना  मानते चले जाते है । 

इसे ही सम्मोहन कहते है ।

अगर  आप ज़रा भी किसी व्यक्ति,वस्तु,  पदार्थ वा वैभव की  तरफ़ आकर्षित हो रहे है, तो यह उनकी सम्मोहन  शक्ति के कारण हो रहा है ।

किसी संस्कार के वश हो रहे है तो यह विकारों का सम्मोहन है ।

यदि आप मन वा  बुधि    को बाबा  की  याद में एकाग्र  नही कर  पा रहे है तो चेक करो ज़रूर कोई शक्ति आप को खींच रही है । जिसे हम आमतौर पर माया  कहते  है । 

पृथ्वी की  चुम्ब्कीये शक्ति सम्मोहन ही तो है ।

बड़ी मछली छोटी मछली  को खाती  है, ये सम्मोहन ही तो है ।

आपवित्रता की आकर्षण  सम्मोहन  ही तो है । 

आलस्य  तथा  सूक्ष्म विकार भी सम्मोहन ही तो है ।

सुंदरता सम्मोहन ही तो है ।

धन के सम्मोहन में आ कर आज का इंसान क्या नही कर रहा ।

बीडी, शराब तथा  जुआ  आदि सब  सम्मोहन   के रुप है  ।

हर व्यक्ति किसी ना किसी   सम्बन्ध अर्थात सम्मोहन  के  कारण दुखी है ।

हमें अपने को दूसरो के सम्मोहन से छुड़ाना  है ।

अपने को खुद सम्मोहित  कर के आगे बढना है ।

किसी एक विचार  को बार बार दोहराए  तो हम खुद से खुद को सम्मोहित कर लेते है ।

यदि  कभी सुबह चार  बजे उठना हो तो बार बार  हम सोचते है सुबह उठना  है बस पकडनी है तो हम सुबह  उठ जाते है  । यही स्वयं  सम्मोहन है ।

बाबा  को याद करना उसके गुणों का सिमरन करना । किसी  स्वमान  में स्थित होना,  मनन चिंतन करना, ये सब स्वयं  को सम्मोहित करना है ।

जब हम अपने  को बाबा  की याद में सम्मोहित कर लेते है तो हम कल्याणकारी बन जाते है ।

हमारी बुरी आदतें छूट जाती है ।

भय, विषाद  ख़त्म हो जाते है ।

बीमारियाँ  ठीक हो जातीं है ।

मुक्ति और जीवन मुक्ति को प्राप्त होते है ।

आप  अपने को  कल्याण   की   ओर लगा  लो नही तो संसार तुम्हे अपनी तरफ़  सम्मोहित कर लेगा  तथा  आपको कठपुतली  की तरह नाच नचाऐगा  । 

ज्ञान,  योग और मनसा  सेवा  में परफेक्ट  बनने का लक्ष्य बना लो तो दुनिया  के सारे  सम्मोहन  ख़त्म हो जायेगे ।

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